वर्तमान में समाचार और विवरण प्राप्ति के दो ढंग अपनाये जा रहे हैं-परम्परागत और आधुनिक। परम्परागत ढंग से समाचार व विवरण प्राप्ति का मुख्य स्त्रोत, सरकारी सूचना कार्यालय होता है-जबकि सिविल अस्पताल, पुलिस स्टेशन, नगर पालिकाओं के अतिरिक्त सामाजिक, धार्मिक संगठनों व राजनेताओं से समाचार भी मिल सकते हैं। इन स्त्रोतों से प्राप्त होने वाली जानकारी निष्पक्ष व पूर्णात सत्य नहीं होती। इसलिए इसमें पाठक कम रूची लेते हैं, अत: पत्रकारों को इन स्त्रोतों पर निर्भर रहने की बजाये समाचार और विवरण प्राप्ति के लिए आधुनिक ढंग प्रयोग में लाने चाहिए। जिसके लिए उन्हें विशेष लोगों से संबंध और सम्पर्क बनाये रखने के अतिरिक्त किसी भी घटना संबंधी प्रत्यक्षदर्शियों से मिलना चाहिए। कुछ घटनाएं ऐसी होती हैं-जिसकी सत्यता प्राप्त करना कठिन होता है और घटना से संबंधित भी घटना को छिपाने या दबाने का प्रयास करते हैं, मगर ऐसी घटना की सत्यता तक पहुंचने के लिए जासूसी करनी चाहिए और जिन लोगों पर घटना छिपाने का संदेह हो-उसके दुश्मनों से संपर्क करने से विवरण प्राप्ति हो सकती है। खेलकूद, भाषण, प्रैस संवाददाता सम्मेलन, स्वागत समारोह आदि कार्यक्रमों की रिपोर्ट कार्यक्रम के स्थान पर जाकर करनी चाहिए। समाचार चित्र की प्राप्ति छायाकार के लिए पत्रकार के समाचार पाने से आसान है। कैमरा लेकर घटनास्थल पर जाकर फोटो ली जा सकती है, जिसका विरोध कम होता है। कई बार ऐसा भी होता है कि, पुलिस या भीड़ फोटो नहीं लेने देती, ऐसी स्थिति में गुप्त रूप से, बिना किसी को संदेह होने के, फोटो लेनी चाहिए। प्रैस कार्ड दिखाने पर किसी भी कार्यक्रम में, जहां प्रैस का प्रवेश वर्जित हो, को छोड़कर, जाकर प्रवेश लेने उपरांत फोटोग्राफी की जा सकती है। लोकप्रिय तथा सुप्रसिद्ध व्यक्तियों से आप अपना परिचय देकर छाया-चित्र ले सकते हैं-जबकि कुछ बदनाम तथा अपराधी व्यक्ति छायाचित्र देने से परहेज करते हैं और फोटो लेते समय मुंह ढक लेते हैं। ऐसे व्यक्तियों के छाया चित्र, उन्हें बिना बताये लेने चाहिए। प्रस्तुति:प्रैसवार्ता
Saturday, January 9, 2010
पत्रकारिता के मान दंड
पत्रकारिता की सबसे बड़ी शर्त है-अपने पाठकों को पहचानना। पाठक कैसी सामग्री चाहते हैं, यदि इसका ज्ञान हो जाये, तो समाचार पत्र सफल हो जाता है। प्रमाणिकता, संतुलन, स्पष्टता, मानवीय दिलचस्पी और जिम्मेवारी के साथ प्रस्तुत प्रकाशन सामग्री पाठकों के दिलों दिमाग पर एक छाप छोड़ते हैं। जाने-माने अंतर्राष्ट्रीय पत्रकार पुलिजर ने ठीक ही कहा था, कि ऊंचे आचार सिद्धांतों के बिना अखबार और उनके पत्रकार सरकारी तंत्र की तरह न सिर्फ असफल होंगे, अपितु समाज के लिए खतरनाक भी हो जायेंगे। इस दृष्टि से पत्रकारिता की चकाचौंध से प्रकाशित होकर इस पेशे में आने वाले लोगों को अपने कर्तव्यों से बारीकी से परिचित होना जरूरी है। पत्रकार चन्द्र मोहन ग्रोवर का कहना है कि इसमें कोई संदेह की गुंजाईश नहीं, कि स्वस्थ पत्रकारिता के लिए मौके पर लिखना-पढऩा, काम के प्रति लगाव, अपने निजीपूर्वाग्रह छोड़कर सत्य की खोज, हर प्रकार के तथ्यों की पुष्टि, चौबीस घंटों की प्रतिबद्धता, पुर्न लेखन तथा निसंकोच शब्दकोष की सहायता लेने जैसे गुणों की जरूरत है। एक पत्रकार को अधिक से अधिक जानने की उत्कंठा और रचनात्मक अभिरूची होना स्वाभाविक है। वहीं छोटी सी घटना की भी गहराई से पड़ताल कर दिचस्प ढंग से पेश करने की योग्यता होनी चाहिए। पत्रकार को निस्पक्ष रहते हुए ईमानदारी से काम करना चाहिए। पत्रकार कितना ही जानकार या प्रभावशाली क्यों न हो, जब तक वह अखबार की सीमा का पालन नहीं करता, वह समाचार पत्र के लिए लाभकारी सिद्ध नहीं हो सकता। समय पर समाचार देना यानि डैडलाईन को समझना पत्रकार के लिए अनिवार्य नियम है। आकस्मिक घटनाओं से अखबार घिसा पिटा लगने से ऊभ जाता है, लेकिन कई बार गर्म खबरें ही नहीं मिलती। ऐसी स्थिति में पत्रकार की रचनात्मकता और क्षमता का पता चलता है। अच्छा पत्रकार वही है, जो स्वयं निर्णय लेने में सक्षम हो। उसे इस बात की प्रतीक्षा नहीं करनी होगी कि मुख्य संवाददाता, समाचार संपादपन या संपादक क्या विषय देंगे। काम पर आते समय भी उसे किसी खबर की गांध मिल गई, तो वह खबर खोजने में लग जायेगा। खबरें खोजना तो ठीक है, परन्तु खबरों के लिए शब्दों से खेलना अवश्य गलत है। लेखक तो शब्दों से खेलते हैं, मगर पत्रकारों को अंकुश रखना होता है। सनसनी पैदा करने के लिए शब्दों से खेलना या तथ्यों को तरोडऩा-मरोडऩा समाचार पत्र के लिए ही नहीं, बल्कि पत्रकार के लिए भी खतरे की घंटी के समान व भारत वर्ष में सरकारी तंत्र से ''गोपनीय'' बनी किसी भी फाईल का विवरण प्राप्त करने के लिए भ्रष्टाचार का सहारा लेना पड़ता है-जबकि कभी-कभी यह सिलसिला टकराव तक भी पहुंच जाता है। यदि कोई पत्रकार किसी व्यक्ति की निजी कम्पनी या संस्थान की जानकारी लेनी चाहे, तो उसे संयम से काम लेना होग, अन्यथा परिस्थिति में बदलाव आ सकता है। सत्ता का वश चले, तो सरकारी विज्ञप्तियों और भाषाओं के अतिरिक्त सब कुछ गोपनीय रहेगा। राष्ट्र हित के गोपनीयता की सीमाएं तय होनी चाहिए, ताकि सरकार और समाज की हर बात खुली और स्पष्ट हो सके। गोपनीय कार्यवाही से गलत सूचनाएं और अफवाहों में वृद्धि होगी और सत्ता का निरंतर दवाब बढ़ेगा, लेकिन नैतिक और सामाजिक मूल्यों के लिए प्रतिबद्धता रहने पर पत्रकार इस स्वतंत्रता का प्रयोग कर सके। मीडिया का सत्ता से प्रेम संबंध अवश्य उसकी विश्वसनीयता को घेरे में ला सकता है। राजनेताओं को समस्याओं की जानकारी देने के लिए मीडिया पर निर्भर रहना पड़ता है, विशेषकर विपक्षी दल वाले मीडिया का सहारा लेकर ही अपनी छवि बनाते हैं, मगर इसे दुर्भाग्य ही माना जायेगा कि मीडिया के माध्यम से छवि सुधारने वाले सत्ता में आते ही मीडिया आलोचना बर्दाश्त नहीं कर पाते। इसी तरह भारत में पुलिसिया तंत्र आज भी विदेशी ब्रिटिश राज के पद चिन्हों पर चल रहा है। पुलिस हर क्षेत्र की अनियमितताओं और ज्यादतियों साथ जुड़ी हुई है, क्योंकि उसके पास कानून और जुल्म का डंडा-बंदूक है। जब भी मीडिया में पुलिस ज्यादतियों के समाचार आते हैं, तो बौखलाई पुलिस में हड़कम्प मच जाता है और मीडिया के साथ कटुता बढ़ जाती है। मधुरता बढ़ाने के लिए मीडिया को अपने ढंग से अपराध समाचारों की खोजकी का सूत्र मजबूत करना चाहिये। मीडिया का काम सरकार की गलतियों की ओर ध्यान का ध्यान आकर्षित करना है, लेकिन राष्ट्र की संप्रभुता उसकी सीमा होनी चाहिए। ओलोचना करते हुए भी राष्ट्रहित में संयम रखते हुए मीडिया को विदेशी ताकतों की इच्छा या जाने-अनजाने उनके हितों की पूर्ति के लिए सरकार और उनकी नीतियों की आलोचना से बचना चाहिए। -चन्द्र मोहन ग्रोवर (प्रैसवार्ता)
पत्रकारिता कैसी होनी चाहिए
वरिष्ठ पत्रकार चन्द्र मोहन ग्रोवर के अनुसार भारतवर्ष की पत्रकारिता तो राष्ट्रीय आंदोलनों के माध्यम से संघर्ष करके तपकर निखरी है। पत्रकारों पर ही भारतवासियों को गर्व है-जिन्होंने देश की स्वतंत्रता के लिए अहम् योगदान दिया। पत्रकार, जहां विदेशी शक्ति से मुक्त करवाने वाली आजादी के दीवाने थे, वहीं देश के नव निर्माण, संस्कृति, आदर्श और देश के प्रति समर्पण भी थे। पत्रकारों के ही अपराध थे-राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जैसे राष्ट्र सेवक, पंडित जवाहर लाल नेहरू जैसे कर्मठ देश भक्त, नेता जी सुभाष चन्द्र बोस जैसे वीर सेनानी। पत्रकारिता इन्हीं के प्रेरक विचारों को जन-जन तक पहुंचाती हुई स्वतंत्रता संग्राम में अपना योगदान दे रही थी। आजादी के बाद देश में बहुत कुछ बदलाव आया और इसी बदलाव के चलते पत्रकारिता ने भी अपना चोला बदला। उसके संजोये हुए आदर्श, मानक सिद्धांत व्यावसायिकता की झोली में समा गये। पूंजीपतियों की चंगुल में फंसकर पत्रकारिता विचार-वाहक हो गई। राष्ट्रीय चेतना का महान आलम्बन, एक सजग क्रियाशील प्रहरी अपनी अस्मिता के लिए चिंतित हो उठा। पत्रकारिता कर्तव्यों, आदर्शों और अपने जनसेवी उद्देश्यों के प्रति सच्ची निष्ठा का प्रतीक है। पत्रकारिता निस्पृह समाज सेवा है, एक तटस्थ विचारक की विचारणा और सूझबूझ का खुला गुलदस्ता है। सामाजिक चेतना की धूरी है, आस्था, तपस्या और सृजना की त्रिवेणी है, एक मिशन है, निष्काम और निस्वार्थ भाव से किये गये कार्यों का दस्तावेज है, लग्र कर्मठता तथा ईमानदारी इन तीन कर्म सूत्रों पर आधारित जीवन दर्शन है, नीर-क्षीर विवेक का प्रतिफल है, मगर वर्तमान पत्रकारिता क्षेत्र में स्वस्थ पत्रकारिता की अनदेखी हो रही है। स्वस्थ पत्रकारिता ही समाचार पत्र की लोकप्रियता और पत्रकारों की अहम् भूमिका, उसकी निस्पक्षता और पैनेपन का प्रतीक तथा जीवंतता है। कलम के सिपाही पत्रकार को बुद्धिजीवी कहा गया है। उसका अपना निर्णय दृष्टिकोण होता है और यही निर्णय, दृष्टिकोण की पत्रकारिता का अलंकार है। यदि यह निर्माणात्मक, जनहितकारी, जन जागरण और जन चेतना की मशाल साबित हुआ तो पत्रकारिता में स्वयं ही चार चांद लग जाते हैं। स्वार्थी और पीत पत्रकारिता से सफलता नहीं मिल सकती। वर्तमान में विश्व भर में विश्व कल्याण, विश्व शांति के प्रयास होने लगे हैं, ऐसी स्थिति में पत्रकारिता को अहम् भूमिका निभानी होगी, क्योंकि उसका दायरा सम्पूर्ण विश्व में सर्व सुलभ साध्य साधना समाचार पत्र है। इस वृहद दायरे का निर्वाह पत्रकार की परिधी में आ चुका है। विश्व स्तरीय पत्रकारिता किसी भी प्रकार की गहन निरीक्षण शक्ति, सूक्ष्म अवलोकन, तात्कालिक जागरूकता और राजनैतिक चेतना द्वारा ही संभव है। पत्रकारिता का ध्येय कोरी आलोचना नहीं है, वह ''ब्लैकमेल'' तो हो ही नहीं सकता, क्योंकि उसके संकीर्णता, प्रलोभन न होना, सत्य को कड़वाहट तक न ले जाने, व्यर्थ के मसाले लगाकर ''सूर्खी'' न बनाने की क्षमता हो। एक स्वच्छ मार्ग निर्मित किया जाये, स्वस्थ जनमत जागरूक करने का प्रयास ही जन प्रशंसा का पात्र बना सकती है और पत्रकारिता का उज्जवल पृष्ठ जन-मन को मोह सकेगा, इसलिए पत्रकारिता का स्वरूप सर्वजन सुखाये हो, सत्यता और वास्तिविकता के प्रतिमानो को वर्तमान के तराजू पर तोल कर प्रकाशित किया जाये, अर्नगल को अर्गल न बनाया जाये और न ही अर्गल को अतिक्रमण कर उसे रौंदा जाये। जरूरत पडऩे पर विचार-विमर्श उपरांत जनोपयोगिता के संदर्भ में निर्णय लिया जाये, अन्यथा जनमानस की मानसिकता बिगड़ते देर नहीं लगती और पत्रकारिता पर कुठाराघात भी हो सकता है।
-चन्द्र मोहन ग्रोवर (प्रैसवार्ता)
-चन्द्र मोहन ग्रोवर (प्रैसवार्ता)प्रैस की स्वतंत्रता और पत्रकार
माननीय उच्चतम न्यायालय ने कुछ पत्रकारों द्वारा सरकारी मकानों को आंबटनके सिलसिले में प्रस्तुत की गई एक रिट याचिका पर अपने निर्णय के साथ पत्रकारों को एक सामयिक सलाह भी दी थी। न्यायालय का कहना है कि, पत्रकार यदि सचमुच प्रैस की आजादी को सुरक्षित रखना चाहते हैं, तो उन्हें सरकारी सुविधाओं का प्रलोभन छोड कर झोंपडिय़ों में रहने के लिए तैयार रहना चाहिए। न्यायालय की सलाह को पत्रकार मानेंगे-ऐसा तो असंभव लगता है, मगर प्रैस की स्वतंत्रता को बनाये रखने के लिए यह जरूरी भी है। पत्रकारिता और प्रलोभन दोनों साथ-साथ नहीं चल सकते। पत्रकारिता को लेकर भी एक उलझन है, दिशाहीनता है कि पत्रकारिता पेशा है, सेवा है या एक मिशन। नौकरी, धंधा है या आदर्श। दुर्भाग्यवश भारत में पत्रकारिता का इतिहास कोई पुराना नहीं है। छापाखाना और प्रैस अखबार कल की ही बाते हैं। इसलिए प्रेरणा और दिशा-निर्देश के लिए इतिहास पुराण में भी गोता नहीं मार सकते। हकीकत से जुड़े लोग आत्म संकट के काल में धनवंतरी से जुड़ जाते हैं और शिल्पी कारीगरी वाले विश्वकर्मा से। अध्यापकों के मार्ग दर्शन हेतु तो गुरू की महत्ता से इतिहास भरा पड़ा है। यह अलग बात है कि, आधुनिक युग तक आते-आते ऐतिहासिक पौराणिक रोमानियत से निकल कर आज सभी व्यवसाय बन गये हैं। परन्तु फिर भी अन्तरआत्मा के संकट काल में आत्म विश्लेषण के लिए इनके पास पुरानी न सही-करीब सात दशक पुरानी पत्रकारिता की एक समृद्ध परम्परा रही है। गणेश शंकर विद्यार्थी, बाबू राम पराडकर, लोक मान्य तिलक, महात्मा गांधी, लाला लाजपत राय, सभी किसी न किसी रूप में अपने काल के पत्रकार रहे और उन्होंने पत्रकारिता की गौरवमयी परम्परा स्थापित की है, परन्तु उस समय पत्रकारों के सामने स्वतंत्रता एक लक्ष्य था। ऊर्जा का अक्षय स्त्रोत। उन दिनों अखबार भी व्यवसाय नहीं माने जाते थे, बल्कि लक्ष्य प्राप्ति के साधन थे। आज पत्रकार पर तिहरी मार है, सरकार के प्रलोभन हैं, जिन व्यावसायिक घरानों के अखबार हैं-उनके अपने खास ध्येय हैं और इन दोनों से कहीं आगे बढ़ कर कांशी राम जैसे राजनीति के पक्षधर उनके पीछे ल_ लिए घूम रहे हैं। इन तीनों से बढ़कर एक अंदर का अन्तद्र्धद भी है-वहीं जिसका जिक्र आरंभ में है। पत्रकारिता आदर्श है या पेशा/परन्तु यह प्रश्र अपने आप में पूर्ण नहीं है। पूरा प्रश्र तब बनता है, जब इसके साथ यह भी जोड़ दिया जाये कि, अखबार आदर्श है या व्यवसाय। कौन नहीं जानता, कितने ही अखबार व्यावसायिक घरानों से जुड़े हुए हैं। वहीं सम्पादकीय नीति में सम्पादक स्वतंत्र नहीं फील्ड के पत्रकार की कौन कहे। आपात स्थिति में दूध का दूध और पानी का पानी हो गया था। रामनाथ गोयनका और उनके अखबारों की बातें जाने दें, तथाकथित राष्ट्रीय अखबार, उन दिनों किसकी रक्षा कर रहे थे-व्यवसाय की या पत्रकारिता धर्म की। सरकार की मार तो और भी भयानक है। वह प्रलोभन भी देती है और भय भी। उसके पास आखिर बल है। पहले लोभ से खरीदो और यदि कोई न खरीदा जाऐ, तो कुचल दो। मुलायम सिंह यादव ने जब प्रैस के विरूद्ध ''हल्ला बोल अभियान'' चलाया था, तो वह उन बचे खुचे पत्रकारों के ही विरूद्ध था, जो प्रलोभनीय जाल में नहीं फंसे थे। समाचार पत्रों में सूचियां छपी थी कि, मुलायम सिंह के प्रलोभनीय जाल में कौन, कितना निहाल हुआ। कांशीराम तो सत्ता की गंध से स्वयं ही पत्रकारों पर टूट पड़े थे। कैमरों की लोकलाज भी उन्हें नहीं रोक सकी। दिल्ली में बैठा अभिजात्य वर्ग कांशी राम के बारे में तो नाक बंद कर कह देगा-उफ! कैसे कैसे लोग राजनीति में आ गये हैं, परन्तु इग्लैंड के जान मेजर के बारे में क्या कहेगे, जिन्होंने 'डेली मिरर' के पत्रकार की सरेआम पिटाई कर दी थी। जान मेजर तो वहां के प्रधानमंत्री थे। सरकारी प्रलोभन तो पत्रकार ठुकरा देगा और प्रैस की रक्षा के लिए झोंपड़ी में रह कर ठिठुर भी लेगा, परन्तु झोंपड़ी के बाहर खड़ी राजनीति कीलाठी एवं दूर बैठी सरकार की भृकुटि से उसे कौन बचाएगा। प्रलोभन से तो बच जायेगा-भय से कैसे मुक्त होगा। दरअसल, जिनके लिए पत्रकारिता व्यवसाय है-उनको न तो प्रलोभन से बचने की जरूरत है और न ही राजकीय कोप में भयभीत होने की। ऐसे पत्रकारों के लिए तो वर्तमान में फलने-फूलने के लिए आदर्श स्थितियां है। चर्चा है कि बिहार के चारा कांड में कई पत्रकार फंसे हुए हैं। आजादी की लड़ाई और आपातकाल में भी ऐसा प्रमाण मिल गया था। पत्रकारिता क्षेत्र में जो
व्यवसाय जान कर आए हैं- उन पर भी आखिर व्यवसाय की शूचिता एवं नैतिकता के आधार पर नियम लागू होंगे ही। पत्रकारिता व्यवसाय में प्रैस की स्वतंत्रता तो एक नैतिक धर्म है। उच्चतम न्यायालय की सलाह का नैतिक पाश उन पर भी लागू होता है। एक वर्ग ऐसा भी है, जो पत्रकारिता को न आदर्श मानता है और न व्यवसाय, बल्कि उससे भी आगे की चीज। वे पत्रकार होते हुए भी झोंपड़ी में ठिठुर रहे पत्रकार के साथ नहीं, बल्कि बाहर लाठी लिए तैनात राजनीति के साथ है। वहीं दरअसल प्रैस की आजादी के लिए सबसे बड़ा खतरा है, क्योंकि घर के अंदर होते हुए भी घर के शत्रु भी हैं। उनके लिए उच्चतम न्यायालय की सलाह की नहीं, किसी निर्णय की आवश्यकता है। कौन जाने, न्यायिक सक्रियता के इस युग में किसी दिन ऐसा निर्णय आ भी जाये।
व्यवसाय जान कर आए हैं- उन पर भी आखिर व्यवसाय की शूचिता एवं नैतिकता के आधार पर नियम लागू होंगे ही। पत्रकारिता व्यवसाय में प्रैस की स्वतंत्रता तो एक नैतिक धर्म है। उच्चतम न्यायालय की सलाह का नैतिक पाश उन पर भी लागू होता है। एक वर्ग ऐसा भी है, जो पत्रकारिता को न आदर्श मानता है और न व्यवसाय, बल्कि उससे भी आगे की चीज। वे पत्रकार होते हुए भी झोंपड़ी में ठिठुर रहे पत्रकार के साथ नहीं, बल्कि बाहर लाठी लिए तैनात राजनीति के साथ है। वहीं दरअसल प्रैस की आजादी के लिए सबसे बड़ा खतरा है, क्योंकि घर के अंदर होते हुए भी घर के शत्रु भी हैं। उनके लिए उच्चतम न्यायालय की सलाह की नहीं, किसी निर्णय की आवश्यकता है। कौन जाने, न्यायिक सक्रियता के इस युग में किसी दिन ऐसा निर्णय आ भी जाये।
कुछ सुना आपने
सभी समाचार अच्छे नहीं होते-जबकि सत्य समाचार तो बिल्कुल ही अच्छे नहीं होते, क्योंकि इनसे हंगामा हो जाता है।
कलम के सिपाही स्याही का ऐसा प्रयोग करें, कि मात्र चंद बूंदे ही लाखों लोगों के मुंह में जुबान डालने का काम करें।
किसी भी देश या क्षेत्र के लिए वह समय सबसे दुर्भाग्य पूर्ण होता है-जब प्रैस भी सत्ता के गठजोड़ का एक हिस्सा बन जाता है।
क्षेत्रीय प्रैस की भूमिका कहीं ज्यादा होती है, क्योंकि इसी से तय होती है-राष्ट्रीय प्रैस की दिशा।
क्षेत्रीय प्रैस हो या राष्ट्रीय, उसका केवल इतना ही काम नहीं, कि वह राजनेताओं का ही गुणगान करते रहे, बल्कि प्रैस की असली जिम्मेवारी तो वह दर्पण बनना है-जो जनता के साथ किए गए वायदों को उजागर करें।
कलम के सिपाही स्याही का ऐसा प्रयोग करें, कि मात्र चंद बूंदे ही लाखों लोगों के मुंह में जुबान डालने का काम करें।
किसी भी देश या क्षेत्र के लिए वह समय सबसे दुर्भाग्य पूर्ण होता है-जब प्रैस भी सत्ता के गठजोड़ का एक हिस्सा बन जाता है।
क्षेत्रीय प्रैस की भूमिका कहीं ज्यादा होती है, क्योंकि इसी से तय होती है-राष्ट्रीय प्रैस की दिशा।
क्षेत्रीय प्रैस हो या राष्ट्रीय, उसका केवल इतना ही काम नहीं, कि वह राजनेताओं का ही गुणगान करते रहे, बल्कि प्रैस की असली जिम्मेवारी तो वह दर्पण बनना है-जो जनता के साथ किए गए वायदों को उजागर करें।
-प्रैसवार्ता न्यूज सर्विस
समाचारों को पाठनीय बनाने के लिए
शब्द: सरल, परिचित, प्यारे, सार्थक, स्टीक व चित्र बना देने वाले होने चाहिए, जबकि सामाजिक व घरेलू शब्द से परहेज करना ठीक है।
मुहावरे: चुभने वाले व सुबोध भले ही हैं, मगर बाजारू नहीं होने चाहिए।
वाक्य: छोटे, क्रमिक, पूर्ण सार्थक व एकसूत्र होने चाहिए।
अनुच्छेद: छोटे, विषय अनुसार, महत्व में क्रम, सक्रिय, सुबोध तथा निरामिक है।
लेखन: साधिकार, सौद्येश्य, दृष्टिकोण स्पष्ट, शैली वार्ता, भाषा सरल व प्रवाह, आलोचना हो, पर आरोप नहीं, व्याख्या हो, वृत्तान्त नहीं तथा सलाह अप्रत्यक्ष हो। प्रस्तुति-प्रैसवार्ता
मुहावरे: चुभने वाले व सुबोध भले ही हैं, मगर बाजारू नहीं होने चाहिए।
वाक्य: छोटे, क्रमिक, पूर्ण सार्थक व एकसूत्र होने चाहिए।
अनुच्छेद: छोटे, विषय अनुसार, महत्व में क्रम, सक्रिय, सुबोध तथा निरामिक है।
लेखन: साधिकार, सौद्येश्य, दृष्टिकोण स्पष्ट, शैली वार्ता, भाषा सरल व प्रवाह, आलोचना हो, पर आरोप नहीं, व्याख्या हो, वृत्तान्त नहीं तथा सलाह अप्रत्यक्ष हो। प्रस्तुति-प्रैसवार्ता
संवाददाताओं के गुण, कार्य और श्रेणियां
पैनी दृष्टि तथा विस्तृत श्रवण शक्ति सत्यनिष्ठा और निर्भीकता मुद्रलेखन, आशुलेखन का टंकण ज्ञान, अनंत जिज्ञासा-वृति व अटल उत्सुकता, मातृभाषा के अतिरिक्त अंग्रेजी भाषा व एक विदेशी भाषा पर पकड़, जटिल घटनाओं व विविध समस्याओं को समझने की शक्ति समाचार सूंघने की क्षमता।
कार्य: समाचारों के शीघ्र संकलन, उनकी सुस्पष्ट व्याख्या तथा शुद्धता के साथ पाठकों हेतु, उसे बोधगम्य बनाने का कार्य संवाददाता का है। गुप्तचर, मनोवैज्ञानिक एवं वकील के गुणों से संपन्न होकर वह अपनी प्रतिभा के बल पर समाज सेवा करता है-भले ही यह कार्य सरल न हो। संवाददाताओं गुप्त समाचार सूंघता है और उसे नाटकीय रूप धारण करना पड़ता है। संवाददाता मनोवैज्ञानिक गुण रखते हुए मनुष्यों से मिलकर दिल की बात को पकड़ सकते हैं। संवाददाता को प्रारंभ में सह समझ लेना चाहिए कि उसका कच्चा माल 'समाचार' है और समाचार के महत्व को उसे सम्यक रूप से जानना होगा, क्योंकि उसकी थोड़ी सी अनवधानतावश एक ''अफवाह'' दंगा उत्पन्न करती है। जिस कारण अव्यवस्था व अनिश्चितता का वातावरण छा जाता है। अकुशल संवाददाताओं के हाथों पड़कर समाचार कभी डायनामाईट से भी अधिक खतरनाक बन जाता है।
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