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Tuesday, December 1, 2009

सास भी बहू क्यों थी?

यदि उनका सरनेम ''त्रिपाठी'' होता तो वे ''त्र'' से आरंभ होने वाले धारावाहिक बनाती यथा ''त्रिशूल'' सास के कमरे में। मगर चूंकि (1) उनका सरनेम कपूर है और (2) महिला ज्योतिषी ने उनसे कहा है, अत: उनके धारावाहिक ''क'' से आरंभ होते है यथा क्योंकि सास भी कभी बहू थी, कुसुम, कहानी घर-घर की आदि। और वे घर क्या हैं, मुगलकालीन महल हैं। भोपाल, नागपुर या इन्दौर में तो ऐसे घर एकाध ही होंगे, फिर वह कहानी, घर-घर की कैसे हुई? यदि वे ''कहानी झोपड़ी झोपड़ी'' की भी बनाती तो उनकी झोपड़ी से हमारे घर शर्मिन्दा होते। उनके घर-घर के पात्र तो महंगी साडिय़ां या सूट पहनते हैं। उन्हें हमारे घर की महिलाएं और हम सपने में छूने या देखने से डर जायेँ। उनके महलों और हमारे घर में एक ही साम्य है, वह यह कि नौकर दोनों जगह नहीं दिखते। भगवान जाने उनके घर में पार्वती भाभी पोंछा कब लगाती होंगी। बहरहाल, रात्रि के नौ बजे के बाद प्रथम पुरूष के घर में महिला सशक्तिकरण प्रहर चालू हो जाता है। नौ बजे तक यदि प्रथम पुरूष ने खाना खा लिया तो खा लिया, नहीं तो उसकी श्रीमती और दोनों बच्चियां सोफे पर दचक कर बैठ जाती हैं। उस समय उनसे एक गिलास पानी भी मिलना मुहाल हो जाता है। उस इडियट से पार्वती भाभी, तुलसी, इत्यादि बार-बार आकर उन बेचारियों को रूला जाती हैं। आंसू पोछने के लिए रूमालों की अदला बदली होने लगती है। हर सीरियल के लिए ताजा रूमाल निकाला जाता है। प्रथम पुरूष के घर के सदस्यों की मानसिक दशा पार्वती भाभी की मानसिक दशा पर निर्भर रहती है। तुलसी दुखी तो उसकी पत्नी महादुखी। उसे वे दिन स्मरण कराये जाते हैं जब उसने दो साल पहले होटल में खाना खिलाने का वादा किया था और वह भूल गया था। वहां तुलसी पर अन्याय होता है यहां उसको दूरदर्शन के सामने बिठाल कर उलाहना दी जाती है। अगर यह और वह डेटिंग करते हैं तो भगवान से प्रार्थना करता है कि हे, भगवान, उसको वह धोखा न दे नहीं तो मेरी शामत आ जायेगी। यदि यह उसको धोखा देता है तो मुझे कसमें खाकर विश्वास दिलाना पड़ता है कि अगले एपीसोड में यह उससे माफी मांग लेगा। मुझे शक है कि आदित्य बिड़ला या अजीम प्रेमजी या टाटाज या मेडम गोदरेज या अम्बानीज इन धारावाहिकों को देखते होंगे। मुझे तो इन धारावाहिकों के धड़ से दिखते ह सिर पैर तो समझ में ही नहीं आते। क्योंकि सास भी कभी बहू थी में मुगल खानदान की तरह एक साथ पांच पीढिय़ों की सास और बहू दिखाई जाती है। एक धारावाहिक में मुझे सन्जू दिखा तो मैंने कहा अरे यह तो क्योंकि, सास भी कभी बहू थी में अंश था, तो मेरी बड़ी बेटी ने ठंडे स्वर में कहा, पापा सीरियल रोज और ध्यान से देखा करो। अंश वहां मर चुका है। उन पात्रों को देखकर मेरी हिम्मत यह बतलाने की नहीं होती कि अमुम पात्र कुसुम में दाहिने तरफ लौंग पहिने थी और इस सीरियल में बायीं तरफ। प्लास्टिक सरजरी में नथुनों के साथ-साथ लौंग का भी स्थानांतरण हो जाता होगा और उस दिन तो हद ही हो गई। मेरा एक मित्र कहने लगा कि उसकी पत्नी कार खरीदने पर जोर दे रही है। मैंने कहा कि खरीद लो। मित्र घबराया हुआ था। मैंने पूछा इसमें घबराने की क्या बात है? तुम रिश्वत तो खाते ही हो कार आसानी से खरीद सकते हो। उसने कहा यह इतनी सरल बात नहीं है। पत्नी देवरानी को कार से धक्का देकर ही घायल करना चाहती है, जैसा कि अमुक सीरियल में हुआ था। ये सीरियल कब तक दिखेंगे कोई नहीं जानता। इसके निर्माता बडज़ात्या या चोपड़ा जैसे गौरतमंद नहीं हैं, किसी पटकथा के कारण उनके रामायण या महाभारत जैसे सीरियल साल दो साल में सप्ताह की रेट से खत्म हो गये। ये सीरियल तो ब्रम्हा की इस दृष्टि से अगली दृष्टि में भी शायद चलते रहें। हर महिला के विवाहेत्तर सम्बन्ध बतलाये जा रहे हैं। हर पात्र को षडय़ंत्रकारी और हत्यारा बतलाया जा रहा है। क्या भारतीय महिलाएं और संस्कृति इतनी ही निकृष्ट है? आश्चर्य है कि जरा-जरा सी फालतू बातों पर बवाल मचा देने वाला कोई भी महिला संगठन इन विकृत प्रस्तुतियों पर आवाज नहीं उठाता। -डॉ. कौशल किशोर श्रीवास्तव (प्रैसवार्ता)

Monday, November 30, 2009

हरियाणा में बिगड़ रही है-कानून व्यवस्था

चंडीगढ़(प्रैसवार्ता) हरियाणा राज्य में निरंतर बिगड़ रही कानून व्यवस्था के चलते प्रदेश में हत्या, डकैती, लूट, फिरौती के लिए अपहरण जैसे अपराधों में वृद्धि हो रही है। राज्य सरकार ने गुडग़ांव उपरांत फरीदाबाद में पुलिस कमिश्ररी शुरू की है, मगर इसके बावजूद भी अपराध थमने का नाम नहीं ले रहे हैं। बढ़ते अपराधिक ग्राफ से चिंतित मुख्यमंत्री चौ. भूपेन्द्र सिंह हुड्डा ने पुलिस को इस संबंध में संख्ती करने के आदेश दिए हैं। ''प्रैसवार्ता'' को मिली जानकारी अनुसार मुख्य मंत्री के गृह जिला रोहतक रेंज में 30 सितंबर 2009 तक 227 हत्याएं हो चुकी हैं-जबकि हिसार रेंज में यह आंकड़ा 174 है। रोहतक रेंज मे 34 डकैतियां पड़ी है-जबकि 157 लूट की वारदातें हुई है-वहीं हिसार रेंज में 17 डकैतियां तथा 76 लूट की वारदातें दर्ज की गई हैं। अम्बाला रेंज में 26 डकैतियां और 71 लूटपाट की घटनाएं, गुडग़ांव पुलिस कमिश्ररी में 14 डकैतियां व 107 लूटपाट की वारदातें हुई हैं। दुराचार के मामले में रोहतक जिला नंबर वन है-जिसमें 133, हिसार रेंज में 112, अम्बाला रेंज मे 107, रेवाडऱी रेंज में 65, गुडग़ांव पुलिस कमिश्ररी में 23 और फरीदाबाद कमिश्ररी में 23 मामले हुए हैं। बच्चों तथा अन्य के अपहरण के मामले में हिसार रेंज में 186, रोहतक रेंज में 177, अम्बाला रेंज में 121, रेवाड़ी रेंज में 89, फरीदाबाद कमिश्ररी में 61 तथा गुडग़ांव कमिश्ररी में 46 अपहरण दर्ज दिये गये। फिरौती के लिए अपहरण की रोहतक और रेवाड़ी रेंज में दो-दो, फरीदाबाद कमिश्ररी में तीन, गुडग़ांव कमीशनरी में एक तथा अम्बाला रेंज में तीन घटनाएं हुई हैं। वैसे राज्य में 31 अक्तूबर 2009 तक अपहरण की 816, हत्याओं की 800, दहेज के लिए हत्याओं की 234 तथा दुराचार की 502 घटनाएं पुलिस में दर्ज की हैं।

.....तो अब डायबिटीज को अलविदाई

चंडीगढ़(प्रैसवार्ता) पी.जी.आई. चंडीगढ़ में दो दिसंबर से इंसुलिन लेने वाले डायबिटीज के रोगियों का स्टेम सेल के माध्यम से उपचार शुरू हो रहा है। इस नई तकनीक से पहले चरण में 30 रोगियों का उपचार किया जायेगा, जिनका पंजीकरण हो चुका है। पी.जी.आई के एंडोक्राइनोलोजी विभाग के प्रमुख प्रोफेसर अनिल भांसली ने ''प्रैसवार्ता'' को बताया कि दुनिया की सबसे बड़ी बीमारी व मुकाबला करने के लिए उनकी टीम तैयार है और आरंभ में एक सप्ताह के भीतर दो रोगियों का उपचार किया जायेगा। प्रथम दौर में 30 रोगियों के ही उपचार पर उन्होंने बताया कि दरअसल ऐसे रोगियों की निगरानी एक वर्ष तक रखी जायेगी और उसके बाद ही अगले चरण में उपचाराधीन रोगियों की संख्या बढ़ाई जायेगी। प्रोफैसर भांसली के अनुसार इस विधी से डायबिटीज के इलाज पर मात्र बीस हजार रुपये खर्चा आता है। उपचार दौरान रोगियों को तीन मास के लिए कुछ दवाएं दी जायेंगी और फिर बोनमैरो से स्टेम सेल निकाली जायेगी। स्टेम सेल निकालने उपरांत रोगी को अस्पताल में भर्ती कर एक दिन में पैन क्रियाज में स्टेम सेल से बनाया गया। इंजैक्शन लगाया जायेगा। यह स्टेम सेल वहां नई बीटा सेल विकसित करने में मददगार होगी, क्योंकि यही बीटा सेल इंसुलिन बनाती है। जिक्र योग है कि मधुमेह में बीटा सेल के नष्ट होने की वजह से ही इंसुलिन नहीं बन पाता है। दुनिया भर में स्टेम सेल को लेकर को बनी चुनौती, कहीं जरूरत से ज्यादा नई कोशिकाएं न बना दें, जो बाद में टयूमर का रूप लेकर नई समस्या उत्पन्न न कर दे, को लेकर कई शंकाएं भी हैं।

Thursday, November 26, 2009

हाये जिया रोय!!! हंसराज बहल

विशेषत: 15 अगस्त और 26 जनवरी पर और सभी-सभी रेडिय़ों पर मो. रफी का गाया जहां डाल-डाल पर सोने की चिडिय़ा करती है बसेरा वो भारत देश है मेरा 'सिकंदरे आजम' के राजेन्द्र कृष्ण के लिखे इस गीत के संगीतकार थे। 'हंसराज बहल' शायद इस गुणी संगीतकार का नाम भी लोगों को आज याद न हो, पर 'मुहोब्बत जिन्दा रहती है मुहोब्बत मर नहीं सकती' (चंगेज खान) भीगा-भीगा प्यार का समां (सावन) जिंदगी भर गम जुदाई का मुझे तरसायेगा और चाहे दिन हो रात हम रहे तेरे साथ (मिस बॉम्बे) हाये जिया रोये (मिलन) आये भी अकेला जाये भी अकेला (दोस्त) आज भी लोगों के कानों में गुंजते रहते हैं। फिल्मों में स्वर्ण युग में नौशाद सी रामचंद्र, बर्मन, रोशन, मदनमोहन, शंकर जयकिशन, ओ.पी. नैयर, रवि जैसे लोकप्रिय संगीतकारों के साथ हुस्नलाल भगतराम, बुलो सी रानी सरदार मलिक, एस. मोहिन्दर, एस.एन. त्रिपाठी, चित्रगुप्त नाशाद के साथ ही हंसराज बहल भी ऐसे ही गुणी संगीतकार थे, जिनकी फिल्में तो ज्यादा लोकप्रिय नहीं पर उन्हें गीत बहल ही लोकप्रिय हुए आज भी पुरानी पीढ़ी की जवान पर है। वे मग्र होकर आज भी रेडियो पर बड़ी तनमयता सुनते रहते हैं और सुनकर उन्हें एक सुखद आनंद की अनुभूति भी होती है। कुंदनलाल सहगत के गीतों पर निस्सिम प्रेम करने वाले हंसराज बहल का जन्म लाहौर में हुआ। गीत-संगीत में बचपन से रूचि थी। उम्र के साथ वे रूचि बढ़ती थी। उम्र के साथ वे रूचि बढ़ती गई। इसी संगीत का जुनून मुम्बई खेंच लाया। 2-3 वर्ष संघर्ष करने के बाद उन्हें पुजारी (1946) में संगीत देने का अवसर मिल गया। इसमें बाल कलाकार बेवी मुमताज ने अभिनय के साथ कुछ गीत भी गाये। भगवान मेरे ज्ञान के दीप जलादे बहुत ही लोकप्रिय हुआ। यह बेबी मुमताज कोई और नहीं सौंदर्य सम्राज्ञी अभिनय सम्पल अभिनेत्री मधुवाला थीं। जिसने बरसो लोगों के दिलों पे राज किया। उसके बाद चुनरिया (1948) में सावन आये रे जागे मेरे भाग सखी में जोहरा बाई और गीतादत्त के साथ आशा भोसले को पहिली बार गीत गाने का अवसर दिया और सिने जगत को एक प्रतिभाशाली उत्कृष्ट गायिका मिल गई। आशा उन दिनों अपना करियर बनाने के लिए संघर्ष कर रही थीं। उन दिनों आशा चिचपोकली की झोपड़ पटटी में रहा सकती थी। एक दिन हंसराज बहल उनस मिलने गये तो आशा के बाल बिखरे हुये थे, साडी भी ठीक नहीं पहिने थी और सर झुकाये घर में पोंछा लगा रही थी। हंसराज बहल उन्हें हस हालत में पहिचान नहीं सके और कहा जाओ आशा मेडम को बुलाओ आशा जी अंदर गई फ्रेश होकर अच्छे कपड़े पहिने अच्छे से बाल बनाये, चोटी डाली और बाहर आईं। हंसराज ने अब उन्हें पहिचान तो लिया था पर बिना कुछ कहे उन्हें 2-3 फिल्मों में गाने का ऑफर दे गये। सुरैया ने भी एक बाल कलाकार के रूप में नौशाद के संगीत निर्देशन से करियर शुरू किया था। बाद में हुस्नलाल भगतराम, अनिल विश्वास बुलो सी. रानी श्यामसुंदर आदि संगीतकारों ने भी उन्हें प्रोत्साहित किया था, पर हंसराज बहल के संगीत में कभी न बिगड़े किसी की मोटर रस्ते में (मोतीमहल) रस्ते में खड़े है हम (राजपूत) दर्दे दिल थाम ले (खिलाड़ी) तड़प ये दिल, सोजा मेरी लाड़ली (रेशमी) जैसे गीत गाकर उनके गीतों से गायन में निखार और दिन-ब-दिन माधुर्य भी बढ़ता गया। अन्य में सब कुछ लुटाया हमने आकर तेली गली में। हाय चंदा हाये परदेस (चकोरी) शिकवा न करेंगे (जेवरात) याद तुम्हारी क्यूं आये बालम (नखरे) तड़प ये दिल (शान) रफी जमाना दस-दस के दस नोट का (शान शमशाद) दिल देके बहुत पछताये (दोस्त)मीठी-मीठी लोरियां मैं धीरे-धीरे गार रे (अपनी इज्जत) मधुवाला जव्हेरी। नैनो की नगरी में आके चले जाना (पुजारी-अमीर बाई) चांद से प्यारे चांद हो (रात की नानी-लता-रफी) दिल है नादान जमानें (मस्तकलंदर आशा, तलत) भूलके कर बैठे सुहानी भूल (राजधानी-तलत-लता) रास्ते में खड़े हैं हम (राजपूत-सुरैया) गीतों ने कभी लोगों को लुभाया था। हंसराज, बहल के भाई गुलशन बहल भी एक फिल्म निर्माता थे। एन.सी. फिल्म की ओर से राजधानी, चंगेजाखान मिस बॉम्बे, मुड-मुड़ के देख, दारा सिंह, सिकंदरे आजम, आदि फिल्मों में हंसराज बहल के गीत बहुत लोकप्रिय हुए। अपने प्रिय गायक सहगत से अपने संगीत में गीत गवाने की बहुत इच्छा थी। हीररांझा फिल्म में सहगल गाने वाले भी थे, पर किस्मत को ये मंजूर न था। इसी बीच सहगत का निधन हो गया। हंसराज बहल की ये हसरत दिल की दिल में रह गई पूरी न हो सकी। 1970 के बाद नये संगीतकारों का साम्राज्य बढ़ता गया। संगीत और गीतों में माधुर्य कम हो गया और आर्केस्ट्रा के आक्रोश के बीच सुरीलापन कहीं खो गया। पुराने संगीतकार गीतकार और गायकों की इतने वर्ष साधना भंग होती दिखाई दी। पुरानी पीढ़ी के संगीतकार इस बदलते वातावरण से समझौता करने में असफल रह गये और पिछड़ते गये। 1983 में नूरजहां भारत आई तो उन पर बगुरवानंद हाल में विशाल स्वागत समारोह किया गया पर संयोजक इस गुणी संगीतकार को आमंत्रित करना भूल गये इसलिए वो बहुत ही विचलित हुए। जीवन के अंतिम दिनों में उनकी आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी। उनकी अंतिम फिल्म थी (दो आंखे) इसमें मो. रफी ने कमल के फूल जैसा बदन तेरा चिकना गाया था। रफी साहब ने उनसे कोई मानधन तो लिया नहीं परउनकी आर्थिक मदद भी की। 20 मई 1984 को उनका निधन हो गया, पर आज भी हाये जिया रोये, जिंदगी भर गम जुदाई का मुहोब्बत जिंदा रहती है भीगा-भीगता प्यार समां, जहां डाल-डाल पर सोने की चिडिय़ा करती बसेरा लोगों के कानों में गूंजती रहती है। -मधु हातेकर, (प्रैसवार्ता)

दर्द का रिश्ता निभाने वाली कलाकार-मीना कुमारी

हिन्दी सिनेमा की एक बहुत बड़ी सुलझी हुई अदाकारा मीना कुमारी का जन्म 1935 में मास्टर अली बक्ष के घर हुआ। बक्ष भी अदाकारी करने के रसिया थे, परन्तु उन्हें फ़िल्मी जगत में असफलता का सामना करना पड़ा, जिससे उनका दिल टूट गया और परिवार गहरे आर्थिक संकट में फंस गया। परिस्थितियां ऐसी हो गई कि उन्हें अपनी साढे तीन वर्षीय बेटी मजहबी उर्फ मीना कुमारी को लेकर फिल्मों में काम ढूंढने के लिए एक स्टूडियो से दूसरे स्टूडियो तक के चक्कर काटने पड़े। बक्ष की भाग दौड़ रंग लाई और मीना को निर्देशक विजय भट्ट की फिल्म ''लैदर फैस'' में बाल कलाकार के रूप में काम करने का अवसर मिल गया। इन फिल्म में मीना के अभिनय की भरपूर प्रशंसा हुई और धीरे-धीरे उसे उच्च फिल्मों में काम करने का निमंत्रण मिलना शुरू हो गया। चार से दस वर्ष की आयु आते-आते मीना ने बाल कलाकार के रूप में 8 फिल्मों में काम किया, जिसमें बहिन, कसौटी और प्रतिज्ञा इत्यादि प्रमुख थी। मीना को फिल्म जगत में लगातार काम मिलता रहा- जिससे परिवार की आर्थिक दशा में सुधार होता गया। बतौर सह नायिका भगरूर, सनम, पीया घर आ जा और बिछड़े बालक फिल्में कौन उपरांत 15 वर्ष की आयु में मीना की पहली फिल्म बतौर नायिका रिलीज हुई, जिसका नाम था, श्री गणेश महिला (1950)। इसके बाद तो उसने ''फुटपाथ'', ''आरती'', ''दिल एक मंदिर'', साहिब-बीबी और गुलाम, बैजू बावरा, चिराग कहां, रोशनी कहां, शारदा, फूल और पत्थर जैसी फिल्मों की झड़ी लगा दी। ''पाकीजा'' में मुख्य भूमिका निभाकर मीना ने अपनी अदाकारी का शिखर दर्शकों के दिलों पर छाप बना दिया। 1951 में एक सड़क हादसे में मीना बुरी तरह घायल हो गई और उसे पांच मास तक अस्पताल में रहना पड़ा। इस दौरान फिल्म निर्देशक जनाब कमाल अमरोही ने उसकी देख भाल की, परिणाम स्वरूप दोनों में मुहब्बत हो गई और 4 फरवरी 1952 को दोनों विवाह सूत्र में बंध गए। इसके उपरांत मीना कुमारी ने और ज्यादा परिश्रम किया और ''बंदिश'', परिणीता, जहारा, कोहिनूर, नौ लक्खा हार, किनारे-किनारे जैसी फिल्में हिन्दी सिनेमा जगत को दी। फिल्मों में मीना निरंतर सफल जरूर होती गई, परन्तु विवाहिता जीवन में असफलताएं निरंतर पीछा करती है। स्थिति ऐसी बन गई कि पति-पत्नी के अलग होने की नौबत आ गई और 5 मार्च 1964 को दोनों अलग-अलग हो गए। जिंदगी के गमों को भूलने के लिए मीना ने शराब पीनी शुरू कर दी। इसी बीच उसकी मित्रता गुलजार, धमेन्द्र व सादन कुमार से भी हुई, मगर सच्चा प्यार किसी से नहीं मिला। सच्चा हमदर्द व सच्चा साथी तलाश कर रही मीना कुमारी ने 31 मार्च 1972 को मौत को गले लगा लिया। कठिनाईयों से जिंदगी शुरू करने वाली और कठिनाईयों से ही जिंदगी समाप्त करने वली थी, महान कलाकार मीना कुमारी, जो आज भी अपने प्रशंसकों के बीच स्थान बनाए हुए है। परमजीत सिंह (प्रैसवार्ता)

नींबू एवं उसके फायदे

नींबू का प्रयोग हर मौसम में हर दष्श्टि से उपयोगी है नींबू के प्रयोग और लाभ हम नीचे दे रहे हैं मुहांसे:- एक तोला मलाई में चैथाई नींबू डालकर मले रंग साफ करेगा, मुंहासों की कील मुलायम करके निकाल देगा। उल्टी:- गुनगुने पानी में आधा नींबू एक छोटी इलायची डालकर तीन-तीन घंटे में पिलाने से लाभ होगा। टायफाईड:- तेज ज्वर के कारण पेट में दवा पानी कुछ न रूक रहा हो ऐसी स्थिति में भी चाय के पानी में दूध के स्थान पर नींबू डालकर पिलाने से लाभ होगा। गैस पेटदर्द:- गैस बन रही हो तो हल्के गुनगुने पानी में एक नींबू निचोड़ कर फिर खाने का सोडा चैथाई चम्मच डालकर एकदम पी जायें, लाभ होगा। साधारण पेटदर्द में जरा सी अजवायन और काला नमक ताजे पानी में डालकर नींबू निचोड़ कर पानी पीने से लाभ होगा। मोटापा:- मोटे आदमी सुबह को निराहार मुंह ताजे पानी में एक चम्मच षहद के साथ एक नींबू निचोड़ कर पानी का सेवन करें तो लाभ होगा। कब्ज:- रोज सुबह उठ कर पहले ताने पानी में एक या आधा नींबू डालकर पीने से पेट साफ हो जायेगा। सिर की रूसी:- बालों में कपास रूसी हो जाने पर नारियल के तेल में नींबू डालकर बालों की जड़ों में लगाए, लाभ होगा। सौंदर्य के लिए:- थोड़ी सी ग्लिसरीन में एक नींबू और थोडा गुलाबजल मिलाकर रख लें। रोज रात को सोते समय मुंह धोकर थोडा सा लोषन हाथ पर लेकर मुंह पर अच्छी तरह मल ले रंग में निखार आयेगा एवम् सौंदर्यवर्धन में लाभकारी होगा। तिल्ली:- एक नींबू प्रतिदिन नमक से खायें, लाभ होगा। मुंह की बदबू:- गुनगुने पानी में नींबू निचोडकर कुल्ला करने से बदबू खत्म हो जायेगी। दांत मजबूत होंगे। खूनी बवासीर:- नींबू को बीच से काटकर उस पर कत्था पीसकर अच्छी तरह लगा दें। सुबह उठकर दोनों टुकड़े चूस लें। लाभ होगा। -प्रैसवार्ता

उम्र की दहलीज पार करने के बाद स्त्री

हर नारी के जीवन में एक बसंत ऋतु आती है, पतझड़ का संदेश लेकर। तब नारी का जननी रूप तिरोहित होने लगता है। और उसके भीतर दवि उभरती है। एक प्रौढवंय माता की विज्ञान की भाषा में इसे रजोनिवृति कहते है। उम्र की इस दहलीज को पार करने के बाद नारी गर्भ धारण करने में असमर्थ हो जाती है। इसे लगता है कि जैसे प्रकृति ने उसका समस्त आकर्षण एक बारगी छीन लिया हो। रजोनिवृति की दशा में अंडाशय में अंणाणु का निर्माण बंद हो जाता है और महिलाएं चाह कर भी गर्भ धारण नहीं कर सकती। कुछ वैज्ञानिकों का कहना है कि राजनेनिवृति के लिए जिम्मेवार है एस्ट्रोजेन नामक हार्मोन के स्राव में होने वाली कमी पिछले दशक तक यह माना जाता था कि एस्ट्रोजेन केवल एक मादा जनन हार्मोन है, जो यौन उतकों, मुख्य रूप से हाइपोथैमेलेस, बाहरी प्रमस्तिष्क, स्तन ग्रंथियों, गभ्राश्य, यौन आदि को हि नियप्त्रित करता है। पर नवीनतम शोध निष्कर्षों से पता चलता है कि एस्ट्रोजेन भले ही मुख्य रूप से एक जनन हार्मोन हो, पर उसके कार्यक्षेत्र में बहुतेरी गतिविधियां आती है, उदाहरण के लिए मूत्र-विसर्जन, पोषक तत्व का अवशोषण एवं उपापचय अस्थि एवं खनिज उपापचय, रक्तचाप एवं हृदय की कार्यप्रणाली याद्दाशत एवं सज्ञानता, जीवन में एक अंतनिहित एक खाय लय एवं लत आदि एस्ट0ोजेन के ही प्रभाव क्षेत्र मेंं होने वाली कमी ने केवल मादा जननतन्त्र के समाथ्र्य का अपहरण कर लेते है, बल्कि शरीर क्रिया प्रणाली की व्यापक रूप से प्रभावित भी करती है। रजोनिवृति के उपरांत न तो अंडाशय में अंडाणु बनते है, न ही एस्ट0हायल या प्रोजेस्टरॉन का संश£ेषण ही होता है। इनिहिबिन ग्लाईको प्रोटीन भी रक्त से गायब होने लगता है। शरीर में होने वाले परिवर्तन को भापॅकर बाह्य प्रमस्तिष्क ग्रंथियां हरकत में आती है तथा फॉलिकिल स्टिमुलेटिंग हार्मोन एवं ल्युटिनाईजिंग हार्मोन का भरपूर स्राव होने लगता है। यही कारण है कि 40-50 के की उम्र में, जब मासिक स्राव जारी रहता है, फॉलिकिल स्टिमुलेटिंग हार्मोन का स्राव बढ़ जाता है, ल्युटिनाईजिंग हार्मोन का चिकित्सा जगत में यह धारण प्रचलित रही है कि रजोनिवृति अंडाशय के अंडाणु के अंडाणु उत्पादन क्षमता के चुक जाने का परिणाम पात्र है। पर अब वैज्ञानिकों के बीच यह विवाद का विषय है कि रजोनिवृति को आमंत्रण देने में अंडाशय एवं हाइपोथेनेमस पीयूष ग्रंथियों की जिम्मेवारी कितनी है। चिकित्सा विज्ञानियों का एक वर्ग कहता है कि रजानिवृति उसके बाद होने वाले मानसिक उतार-चढ़ाव अंडाशय में होने वाले परिवर्तन के परिणाम मात्र है। पर वैज्ञानिकों का दूसरा वर्ग मानता है कि रजोनिवृति केन्द्रीय सा्रयुतंत्र में होने वाले परिवर्तन का परिणाम है। यही परिवर्तन नारी के गर्भ धारण करने की क्षमता को भी प्रभावित करता है। चाहे जो भी हो, रजोनिवृति नारी के जीवन में एक नया मोड़ लेकर आती है। उसके शरीर में परिवर्तन का एक चक्र शुरू हो जाता है। इस समय वह भावना के एक झानावत में फंसी होती है। कभी उसे अपनी स्वरूप दिव्य एवं उज्जाला नजर आता है तो कभी अपने को लुष्ठिता से अधिक आंकती इस अवस्था में महिलाएं चिड़चिड़ी हो जाती है, ईष्यार्लु हो जाती है। आमतौर से महिलाओं में से परिवर्तन रजोनिवृति की शुरूआती दौर में ही परिलक्षित होते है, पर कुछेक स्ऋियों की तो यह जीवन पद्धति ही बन जाती है। रजोनिवृति को टालने के अनेक प्रयास किए गए है। कभी एस्ट्रोजेन को सेवन कराकर तो कभी विटामिन की गोलियां पकड़ा कर। पर अभी तक इसमें कोई कामयाबी नहीं मिली है। -मनमोहित (प्रैसवार्ता)

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