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Wednesday, December 30, 2009

किस के संरक्षण से चल रहे है यह खानदानी दवाखाने

करनाल(प्रैसवार्ता) एक ओर जहां नकली दवाओं नकली दवा विक्रेताओं और झोला छाप डाक्टरों की मार झेल रहा है। वहीं बलड़ी बाई पास और करनाल की पुरानी जेल के पास टेंटों में चल रहे खानदानी दवा खाने चर्चा का विषय बने हुये हैं। जीपों, मोटरसाईकिलों, मिनी बसों और कारों से सुसज्जित यह खानदानी दवा खाने पर्दे के पीछे क्या खेल रहे हैं यक एक गहरा रहस्य है। बलड़ी बाई पास पर करोड़ों रुपये की बेशकीमती जमीन पर वर्षों से टैंटों में चल रहे इस दवाखाने की आड़ में यहां भरा पूरा परिवर है जिस में महिलाएं और बच्चे भी शामिल हैं। वैसे तो सबसे आगे टैंट में जड़ी बूटियों के जार भरे रखे हैं पर यहां असली धंधा नशीले पदार्थों की तस्करी का चल रहा है। वैसे दिन भर यहां पुलिस की जिप्सी खड़ी रहती है पर शाम ढलते ही यहां असली काम शुरू हो जाता है। राजस्थान पथ परिवहन की डीलक्स और वातानुकूलित बसों के इलावा राजस्थान से पंजाब, चंडीगढ़, हिमाचल प्रदेश और जम्मू काश्मीर की ओर जाने वाली टूरिस्ट बसें रूकती हैं जिन के माध्यम से इस दवाखाने में नशीले पदार्थ आते हैं। इसी दवाखाने में नशीले पदार्थों की खेप पुरानी जेल के पास चल रहे खानदानी दवाखाने पर पहुंचती हैं। लगता है दवा खाने की आड़ में नशीले पदार्थों की तस्करी का धंधा चलाने वालों की पहुंच उपर तक लगती है। इसीलिए तो वहां से गुजरने वाले राज्य के वरिष्ठ अधिकारियों को शायद नींद आ जाती है जो उन्हें इतनी महंगी जमीन पर अतिक्रमण तक दिखाई नहीं देता। और तो और इन टैंटों में चल रहे दवाखानों में बिजली का प्रकाश भी होता है। अस्पताल संचालक कुंडी लगाकर बिजली चोरी करते हैं।

तेरह साल से फरार है दुष्कर्म का आरोपित डीआईजी

जयपुर(प्रैसवार्ता) हरियाणा के पूर्व डीजीपी एसपीएस राठौर को छेड़छाड़ के मामले 19 साल बाद भले ही छह माह की सजा मिल गई हो, लेकिन राजस्थान में एक आदिवासी महिला का अपहरण व देहशोषण के आरोपित डीआईजी मधुकर टंडन को आज तक पुलिस नहीं खोज पाई है। यही नहीं सर्विस रिवाल्वर भी अभी तक टंडन के पास ही है। इस दौरान प्रदेश में तीन सरकारें बदल चुकी हैं, लेकिन पीडि़ता को न न्याय मिला और न ही मुआवजा। बलात्कार के आरोपित टंडन की ओर से धमकाए जाने के बाद पीडि़ता के पति को पुलिस की नौकरी तक छोडऩी पड़ी। हैरानी की बात तो यह है कि पुलिस की क्राइम ब्रांच ने फाइल ही बंद कर दी है। दौसा के बांदीकुई थाने में चार फरवरी 1997 को मधुकर टंडन के खिलाफ उनके मातहत सिपाही ने पत्नी का अपहरण कर देहशोषण का मामला दर्ज कराया था। थानाधिकारी तेजपाल सिंह के मुताबिक पुलिस ने पीडि़ता का मेडिकल मुआयना कराया व घटनास्थल से अपहरण में प्रयुक्त कार बरामद कर साक्ष्य जुटाए। इसके बाद राज्य सरकार ने टंडन को सेवा से बर्खास्त कर दिया। मामला दर्ज होने के समय नोएडा निवासी टंडन छुट्टी पर थे जो लौटकर नहीं आए। पुलिस की सक्रियता का आलम यह है कि जिस मधुकर टंडन की उसे तलाश है उसकी फोटो तक थाने में नहीं है। सबसे पहले जांच तत्कालीन डीएसपी लीलाधर को फिर एसपी रामेश्वर सिंह और सौरभ श्रीवास्तव को सौंपी गई। अंतत: जांच पुलिस की क्राइम ब्रांच को दे दी गई जिसके एएसपी बन्ने सिंह ने आरोपित का पता नहीं लगने पर इस प्रकरण में एफआर लगा दी और अदालत ने चार्जशीट पेश कर दी। अदालत ने टंडन को स्थाई वारंटी घोषित कर रखा है। सीआईडी सीबी के एसपी रोहित महाजन का कहना है कि बर्खास्त डीआईजी टंडन का प्रकरण पुराना हो गया है। आरोपित को गिरफ्तार करने के लिए अन्य एजेंसियों की मदद ली या नहीं, इस बारे में ज्यादा जानकारी नहीं है। क्राइम एडीजी केएल बैरवा का कहना है कि आरोपित को पकडऩे के प्रयास किए गए, लेकिन पता नहीं चलने पर क्राइम ब्रांच ने काफी पहले ही एफआर दे दी थी। उसके खिलाफ अदालत ने स्थाई वांरट जारी कर रखा है। पता चलते ही गिरफ्तार कर लिया जाएगा।

बेटियों ने दिया पिता की अर्थी को कंधा

रेवाड़ी(प्रैसवार्ता) पाल्हावास में परिजनों ने पिता की अंतिम इच्छा पूरी करने के लिए रूढि़वादिता को किनारे करते हुए पुत्रियों ने कंधा देने की परंपरा शुरू की तथा अस्थियां विसर्जन के स्थान पर स्कूल के गरीब बच्चों को गर्म कपड़े और जूते वितरित किए। पाल्हावास निवासी मास्टर महेंद्रसिंह का गत दिवस लंबी बीमारी के बाद निधन हो गया। उसकी शव यात्रा को उसके पुत्र सतीश यादव तथा तीन पुत्रियों मीनू, मधु तथा कुसुम ने कंधा दिया। विशेष बात यह रही कि परिजन हिंदू रीति-रिवाज के अनुसार उनकी अस्थियों को विजर्सन के लिए किसी पवित्र स्थान पर नहीं ले गए तथा उस पर आने वाले खर्च को गांव के राजकीय उच्च विद्यालय में पढऩे वाले गरीब व जरूरतमंद बच्चों पर लगा दिया। बच्चों को गर्म कपड़े तथा जूते वितरित किए। पुत्र सतीश यादव ने बताया कि उनके पिता मास्टर महेंद्रसिंह ने बीमारी के दौरान इच्छा जाहिर की थी कि उसे कंधा देने का अधिकार उसकी पुत्रियों को भी दिया जाए।

Saturday, December 26, 2009

समाचार संकलन:कुछ महत्वपूर्ण पहलू

पत्रकारिता अब केवल मिशन नहीं, बल्कि एक रोमांचक व्यवसाय के रूप में प्रतिष्ठित हो चुकी है । समाज में पत्रकार के सम्मान, प्रतिष्ठा एवं महत्व से प्रभावित होकर ही अनेक युवा साहसी स्वयं को पत्रकार कहलाने में गर्व एवं संतोष का अनुभव करते हैं । किन्तु नवोदित पत्रकारों को यह जान लेना चाहिए कि पत्रकारिता कोई हंसी खेल नहीं है । पत्रकारिता रोमांचक व्यवसाय के साथ ही अत्यंत जोखिमपूर्ण एवं उत्तरदायित्वपूर्ण जॉब है । ऐसे में, किसी छोटे बडे दैनिक या साप्ताहिक समाचार पत्र के संवाददाता बनने मात्र से येन-केस प्रकरण किसी समाचार पत्र अथवा पत्रकार संगठन के सदस्य । पदाधिकारी बनने मात्र से किसी व्यक्ति का स्वयं को पत्रकार स्वीकार कर लेना अपने में काफी नहीं है । बल्कि नवोदित पत्रकारों को पत्रकार के गुण, तकनीकी पहलुओं और दायित्वों के मूलभूत मानदण्डों को आत्मसात करना परम आवश्यक है । यहां हम नवोदित पत्रकारों के लिए कुछ आधारभूत सैद्वांतिक जानकारी की चर्चा कर रहे हैं जिसके पर्याप्त ज्ञान के बिना स्वंय को पत्रकार प्रतिष्ठित करना इस पेशे की गरिमा से खिलवाड़ मात्र ही कहा जायेगा । संवाददाता और संवाद यानी पत्रकार और समाचार एक दूसरे के पूरक है । अत: यदि आप पत्र प्रतिनिधि या संवाददाता हैं, तो आपको मालूम होना चाहिए, कि समाचार किस चिडिया का नाम है? समाचार की प्रचलित परिभाषा में कहा जाता है कि यदि कुत्ता आदमी को काट ले, तो यह समाचार नहीं है । अगर आदमी कुत्ते को काट ले, तो यह समाचार है । समाचार को हमेशा नवीन, रोचक, मनोरंजक एवं महत्वूपर्ण होना चाहिए । अंग्रेजी शब्द न्यूज के चार अक्षरों क्रमश: नार्थ यानी उत्तर, ईस्ट यानी पूर्व वेस्ट यानी पश्चिम और साउथ यानी दक्षिण अर्थात् चारों दिशाओं का दर्शन जिसमें हो वही न्यूज है । वैसे भी न्यूज जिस न्यू शब्द से बना है, उसका अर्थ होता है - नया, यानी समाचार में नयापन होना चाहिए । वैसे समाचार की एक गंभीर परिभाषा यह भी है-जिसे कोई दबाना चाह रहा हो, वह समाचार है, बाकी सब विज्ञापन है। किसी भी संवाददाता के लिए जरूरी है कि उसमें समाचार सूंघने का गुण हो तथा समाचार आयोजन की क्षमता हो। इसके लिए उसका व्यवहार कुशल होना तथा विश्वसनीय होना जरूरी है । आंखों देखी और सुनी सुनाई बातों से ही समाचार नहीं बन जाता । जो आपने सुना है, वह मात्र अफवाह भी हो सकती है । जो आपने देखा है, वह घटना का एक पक्ष भी हो सकता है । इसलिए देखने सुनने के बाद भी संवाददाता का दायित्व है कि वह घटना की खोजबीन करे, उसकी गहराई में जाये । संबधित पक्षों की जानकारी लेने के बाद ही समाचार लिखें । पत्रकारिता में विश्वास बहुत आवश्यक है । आपको अपने समाचार स्रोत या समाचार सूत्रों पर विश्वास होना चाहिए और समाचार सूत्र को आप पर विश्वास होना चाहिए कि आप उसका नाम आउट नहीं करेगें । इसी विश्वास की धुरी पर बडे से बडे गोपनीय मामले भी समाचार पत्रों में उछल जाते हैं । समाचार स्रेातों से पत्रकार का सामंजस्य ही उसे श्रेष्ठ संवाददाता के रूप में प्रतिष्ठित कर सकता है। संवाददाता को अपने पूर्वाग्रहों से ग्रस्त होकर, व्यक्तिगत स्वार्थ से पूरित होकर या मात्र अपनी वाह-वाही के लिए कोई समाचार नहीं देना चाहिए। पत्रकार के निर्लिप्त एवं निष्पक्ष होना चाहिए। समाचार और समाचार स्रोत से परिचय के बाद अब प्रश्न है कि समाचार लिखकर सम्पादक को कैसे भेजा जाये? प्राय: संवाददाता यह शिकायत करते हैं कि उन्होंने तो बहुत मेहनत करके दो पृष्ठ का समाचार भेजा था, लेकिन अखबार में मात्र चार छ: पंक्तियों ही प्रकाशित हुई, और इसके लिए पत्रकार बंधु डेस्क एडीटर या समाचार संपादक पर भेदभाव आदि का आरोप लगाने लगते हैं । लेकिन जरूरी यह भी है कि समाचार संकलन के बाद समाचार लेखन की कला भी संवाददाता को आती हो । किसी भी समाचार का पहला आकर्षण उसका शीर्षक होता है । शीर्षक पढ़कर जो आकर्षण, जो उत्कंठा पाठक के मन में उत्पन्न हुई, यदि वह आकर्षण समाचार के पहले पैराग्राफ (अनुच्छेद) में बरकरार नहीं रहा तो समझिये कि आपका समाचार लिखना बेकार है। इस प्रकार दुकानदार विशिष्ट सामान को दुकान की शोविन्डो में रखता है ताकि ग्राहक आकर्षित हो, इसी प्रकार समाचार का पहला अनुच्छेद पूरे समाचार की शो विन्डो होती है। इस पहरे के पैरेग्राफ को अंग्रेजी में इन्ट्रो कहते हैं । अत: समाचार लेखन में सर्वाधिक महत्ववूर्ण उसकी इन्ट्रों लिखना ही होता है। एक आदर्श इन्ट्रों वह कहलायेगा, जो प्रत्येक वर्ग के पाठक को रूचिकर लगे और पाठक को पूरा समाचार पढऩे के लिए मजबूर कर दे। हालांकि, इन्ट्रों लिखना आसान नहीं, लेकिन यदि सही इन्ट्रों लिख दिया, तो बाकी समाचार लिखना कठिन भी नहीं है। इन्ट्रों लिखते हुए ध्यान रखना चाहिए कि वह समाचार के अनुकूल हो। इन्ट्रो में समाचार की सबसे महत्वपूर्ण बात सबसे रोचक बात आ जानी चाहिए। जहां तक हो सके इन्ट्रो छोटा और स्पष्ट हो। इन्ट्रों संक्षिप्त होगा तो पढऩे में तो आसान होगा ही, उसमें संप्रेषण शक्ति भी अधिक होगी। माना जाता है कि समाचार में क्या कहां कब और क्यों और किस के उत्तर पाठक को मिल जाने चाहिए। लेकिन ये सब जबाव इन्ट्रों में दिये जाने कतई जरूरी नहीं है। अच्छे इन्ट्रों में प्रभाव, पठनीयता और भाषा में बहाव होना चाहिए। बहुत से पाठक समयाभाव के कारण अखबार की प्रमुख हैडलाइन ही पढ़ते हैं। साथ ही, वे समाचारों की इन्ट्रों भी जरूर पढ़ते हैं और इन्ट्रों से ही पूरे समाचार का सारांश समझ लेते हैं। यदि एक सफल इन्ट्रों ने पाठक के मन में समाचार के प्रति रूचि पैदा की है तो पाठक को समाचार के अंत तक ले जाने का काम भी संवाददाता या समाचार सम्पादक का है। अत: समाचार को पिरामिड के उल्टे आकार में लिखना चाहिए अर्थात् सर्वाधिक महत्पवूर्ण बात उपर से प्रारंभ करें और जैसे जैसे महत्व या रूचि कम होती जाये, वैसे ही तथ्यों को नीचे की ओर लेते आना चाहिए इस प्रकार किसी भी सफल समाचार का पहला पैराग्राफ सर्वाधिक महत्पवूर्ण और अंतिम पैराग्राफ सबसे कम महत्व का होना चाहिए। ऐसे समाचार में समाचार सम्पादक को भी पर्याप्त सुगमता रहती है । यदि समाचार प्रकाशित करने के लिए स्थान कम है तो यथानुरूप समाचार के अंतिम पैरा काटा जा सकता है। कई बाद पूरा समाचार कम्पोज होने के बाद भी उसक छोटा करने की जरूरत सब एडीटर को होती है। ऐसी स्थिति मेें पूरा समाचार दुबारा कम्पोज कराना संभव नहीं होता, अत: वह अपेक्षाकृत कम महत्व के अंतिम एक या दो पैराग्राफ उड़ा देता है ओर उसके बाद भी समाचार पूरा का पूरा रहता है । यही सफल समाचार लेखन की पहचान है । इस प्रकार एक संपूर्ण सफल समाचार में क्या, कयों, कहां, कब, कौन, कैसे और क्यों के उत्तर पाठक को मिलने चाहिए, साथ ही समाचार की पृष्ठ भूमि का परिचय भी पाठक को मिले। समाचार की भाषा सरल, स्पष्ट और तारतम्यता पूर्ण होनी चाहिए। यूं तो समाचार की अनेकानेक श्रेणियां हैं, फिर भी अपराधिक एवं साम्प्रदायिक उन्माद के समाचार लिखते तथा छापते समय विशेष ध्यान रखा जाना चाहिए । ऐसे समाचारों में जब तक कि आवश्यक न हो किसी व्यक्ति का नाम, धर्म, जाति का उल्लेख न करें। समाचार पत्र का काम सबंध्ति महिला अथवा पुरूष की प्रतिष्ठा को गिराना नहीं होता है। विशेषत: बलात्कार के मामले में पीडि़त युवती का नाम नहीं दिया जाना चाहिए । मेरे विचार से तो बलात्कार एवं यौन उत्पीडऩ के समाचारों में युवती की जाति, ध्र्म का उल्लेख भी नहीं किया जाना चाहिए। समाचार है कि जंगल में अकेली दलित युवती बलात्कार की शिकार, क्या इस बलात्कार की घटना में पीडि़त युवती का दलित होना ही कारण है? क्या जंगल में अकेली सवर्ण युचती, इसलिए बलात्कार की शिकार नहीं होगी कि वह उच्च जाति की है? बलात्कार, यौन अपराधें आदि के समाचारों को अध्कि विस्तार नहीं देना चाहिए । पत्रकार को उन सब बातों से भी परहेज करना चाहिए, जिनसे समाज में वैमनस्य, तनाव और घृणा व्याप्त होने की भूमिका बनती हो । पत्रकारिता में जिनता रोमांच, जितनी प्रतिष्ठा है, उतना ही खतरा, जोखिम भी पत्राकार को उठाना पड़ सकता है । समाचार से जुड़े विविध् पक्षों, पुलिस, अपराध्ी तत्वों, अराजक तत्वों से जितना खतरा पत्राकार को है, पहीं वैधनिक दुष्टि से पत्राकार को जिस खतरे का समाना करना पड़ सकता है-वह है मानहानि । भा0द0वि0 की धरा 499 में मानहानि की शिकायत पर प्रैस एवं पत्राकार पर मुकदमा चलाने की पूरी व्यवस्था है । कुछ पत्रकार साथी समझते हैं कि तथाकथित बताया जाता है चर्चा है आदि लिखने मात्रा से वे मानहानि के दावे से बच सकते हैं । ऐसा समझना भ्रम है। दूसरों के आपत्तिजनक वकतव्यों या भाषण के अंश छापने से भी आप मानहानि के दोर्षी ठहराये जा सकते हैं । अत: पत्रकार को ध्यान रखना चाहिए कि समाचार में वह कभी भी खुद पार्टी न बने । तथ्यों को खुद ही सारी कहानी कहने दीजिये । किसी के चरित्रा, आचरण या घटना के सबंध में खुद कोई निष्कर्ष कभी नहीं निकालें । जब तक कि आपके पाए ऐसा सबूत न हो जिसे कोर्ट में प्रस्तुत किया जा सके, तब तक किसी के व्यवहार या चरित्र पर आरोप नहीं लगाना चाहिए । पत्रकार बिना किसी दबाव के निष्पक्ष एवं निडर होकर अपना कर्तव्य पालन करना चाहिए । आप यदि दम से पत्रकार के रूप में कार्य करने को दृढ़प्रतिज्ञ हैं तो आपका स्वागत है । उक्त आधर मूलक बातों के साथ साथ अन्य सभी तौर तरीके भी अभ्यास करते करते स्वत: ही आप सीख जायेंगे। डा.मनोज अबोध (प्रैसवार्ता)

जल प्रदूषण:कारण और निवारण

जल प्रदुषण की समस्या दिनों दिन बढ़ती जा रही है। पृथ्वी का दो तिहाई भाग जल होते हुए भी इसमें से मानव के उपभोग योग्य जल ही मात्रा कम है। प्रकृति से प्राप्त जल का प्रमुख स्त्रोत वर्षा है। वर्षा का पानी ही भूमिगत जल स्त्रोत बनता है। जल ही यौगिक पदार्थ है। यह एक रंगहीन द्रव है। दो परमाणु हाइड्रोजन व एक परमाणु ऑक्सीजन मिलकर एक पानी बनाते है।वर्षा का जल आरंभ में शुद्ध होताह है, किंतु वायुमंडल की ऊपरी सतहों से जैसे-जैसे यह पृथ्वी पर आता है। इसमें धूल के कण, गैसें व अन्य अशुद्धियां मिल जाती है। जल जीवन के लिए बहुत आवश्यक है। कहा भी है ' बिन पानी सब सून।' शरीर का 70 प्रतिशत भाग जल है। अशुद्ध जल शरीर को हानि पहुंचाता है और अनेक बीमारियों उत्पन्न करता है। विशेषकर हैजा, पेचिश, पीलिया, टाइफाइड, मलेरिया, पेट कें कीड़े आदि बिमारियां, दूषित जल के कारण ही फैलती हैं। विश्व स्वास्यथ संगइन ने शुद्ध पेयजल के भौतिक व रसायन गुण निश्चित किए हैं। भौतिक मानक के अनुसार पेयजल स्वच्छ, शीतल, निर्मल, गंधरहित तथा स्वादहीन होता है। रासायनिक मानक के अनुसार पेयजल का पी.एच.मात्र 7 व 8.5 के बीच में होना चाहिए। जैविक मानक के अनुसार शुद्ध पेयजल में अपद्रव्य बेसिलस कोलाई प्रति 100 मि.ली. में एक भी नहीं होना चाहिए तथा अन्य कोलीफार्म बैक्टीरिया 10 से अधिक नहीं होना चाहिए। अशुद्ध जल में कैल्शियम सल्फेट, लोहा, मैग्नीज, तांबा, जिंक, सीसा, कैडमियम, पारा तथा अन्य रासायनिक अम्ल आदि पाए जाते है। जब कोई संक्रामक रोग फैलता है तो उसके रोगाणु पानी में घुलकर ही व्यक्ति को रोगग्रस्त करते हैं। कुएं, बावड़ी व जलाशयों का पानी प्रदूषण के कारण दूषित हो जाता है। जनसंख्या विस्फोट से भी पेयजल की समस्या पैदा की है।
जल प्रदूषण से कैसे बचे:- अशुद्ध जल को शद्ध करने की कई सामान्य विधियां हैं। उनमें कुछ इस प्रकार है-
भौतिक विधियां-1 पानी को निथारकर कुछ समय के लिए टैंक या बर्तन आदि में ठहरने देते है। इसेस अशुद्धियां भारी होने के कारण नीचे बैठ जाती है और ऊपर पानी साफ रहता है।
2 पानी को उबालकर भी उसे शुद्ध किया जाता है। इससे कीटाणु नष्ट हो जाते हैं। उबला हुआ पानी फिर किसी पात्र में छान लेना चाहिए। उबला हुआ पानी पीने में स्वाद रहित और फीका होता है। पानी को छाने के लिए जो कपड़ा काम में लें वह साफ व गाढ़ा होना चाहिए। उबालने से पानी की अस्थाई कठोरता नष्ट हो जाती है। जल शोधन की परम्यूटिट विधि भी है जिसमें कठोर जल को परम्यूटिट व माटी रेत के बीच गुजारकर छाना जाता है।
3 स्त्रावण विधि से भी पानी को शुद्ध किया जाता है। इसमें पहले पानी को उबालकर भाप में परिवर्तित कर देने हैं और फिर उस भाप को शीतकों द्वारा द्रवीभूत कर देते है। यह पानी उत्यंत स्वच्छ और गुणकारी होता है। इस पानी का उपयोग दवाओं तथा रासायनिक कार्यो में किया जाता है।
4 बाजार में पानी छानने का फिल्टर भी मिलता है। इससे पानी साफ भी मिलता है पर वे महंगे होते है। जो आम व्यक्ति की पहुंच से दूर है। ऐसे बड़े पात्र भी मिलते हैं जिसमें कोयला, रेत आदि भरकर पात्र के पेंदे से साफ पानी निकाल लिया जाता है।
रासायनिक विधियां-1 गंदे पानी का शुद्ध करने के लिए सबसे सस्ता तरीका पानी में फिटकरी घोलना है। फिटकरी के कारण मिट्टी व अघुलशील पदार्थ नीचे बैठ जाते हैं। सौ ग्राम फिटकरी का टुकड़ा लेकर उसे पानी के बर्तरन में 5-7 मिनट तक घुमाने से अशुद्धियां नीचे बैठ जाती है। फिटकरी का यह टुकड़ा फिर काम में लिया जात सकता है।
2 पानी को कीटाणु रहित करने के लिए लाल दवा, क्लोरीन, ब्लीचिंग पाउडर, चूना भी काम में लिया जाता है। उचित मात्रा में यह कुओं, बावड़ी व पानी की टंकियों में डाला जाता है। बड़े-बड़े नगरों में नल के पानी को शुद्ध करने के लिए टंकियों में बड़े बड़े फिल्टर लगाए जाते हैं। कहीं-कहीं पानी एक तालाब से दूसरे तालाब में डाला जाता है। इन तालाबों में रेत व बजरी की मोटी तहें होती है। इन तहों में से होकर पानी छनता हुआ जल संग्रलय में पहुंचता है। बनारस के तटों पर होने वाले प्रदूषण से भी बचाव आवश्यक है। गंगा में बहने वाले दुर्गन्धयुक्त शवों के कारण होने वाले प्रदूषण से बचाव जरूरी है। इसक लिए बिजली से चलने वाले शवदाह गृह बनाए जाने चाहिए। धार्मिक दृष्टि से केवल शव ी अस्थियां गंगा में विसर्जित की जा सकती है। नदियां भारतीय संस्कृति की धरोवर है, इन्हें शुद्ध रखना हमारा पुनीत कत्र्तव्य है। पानी की समस्या के हल के लिए प्राचीन जल स्रोतों तथा तालाब, कुएं, बावडिय़ां, नोल-नालियां, कुंड आदि को स्वच्छ रखकर उनका संरक्षण भी जरूरी है। जल स्रोतों के आस-पास कल-कारखाने स्थापित नहीं किए जाएं। इनसे जल प्रदूषित होता है। जो जल वितरण किया जाए वह फिल्टर किया हुआ हो। यह सत्य है कि शुद्ध वायु व शुद्ध पानी ही मानव को स्वस्थ जीवन प्रदान करते है। राजेश वर्मा (प्रैसवार्ता)

एक अनोखा उल्लू

उल्लू एक अनोखा पक्षी है। दिन में इसे कुछ दिखाई नहीं देता। रात में ही यह अपने शिकार के लिए निकलता है। उल्लू का रंग अधिकतर सुरमई होता है। कुछ उल्लू मटमैले होते है। इसका सिर काफी बड़ा, बिल्ली की तरह गोल और बालों से भरा होता है। आंखें मनुष्यों की तरह खोपड़ी में स्थित होती है। उल्लू को शिकारी पक्षी माना जाता है, परंतु इसका शिकार करना पाप माना जाता है। यह लक्ष्मी का वाहन भी है। उल्लू की तीन जातियां: घुग्घू उल्लू और खूसठ। इसमें से सबसे छोटे को उल्ले कहते हैं और सबसे बड़े को घुग्घु के नाम से जाना जाता है। घुग्घु कहलाने वाली जाति के बाल और पंख मुड़ कर सींग की तरह हो जाते हैं। इसकी तीन उंगलियां आगे की ओर होती है और एक पीछे की ओर। यह अपनी अगली उंगलियों को पीछे की ओर भी आसानी से मोड़ लेता है। पंख कोमल और कान बड़े-बड़े होते हैं। उड़ते समय यह अपने पंखों से बिल्कुल भी आवाज नहीं करता। रात के समय चाहे जितना भी सन्नाटा हो, इसके शिकार को इसके आने का बिल्कुल भी आभास नहीं होता। इसके पैर अंगूठे तक पंखों से ढके रहते हैं। यह शिकार को पूरे का पूरा निगल जाता है। इसलिए शिकार साफ करने के लिए उल्लू अपने पैरों की मदद नहीं लेता।उल्लू लगभग 14 इंच तक लंबा होता है। चूहे, मक्खियां, सांप ओर कीड़े-मकौड़े इसका ्िरप्रय भोजन है। उल्लू की भद्दी आवाज के कारण ही लोग इसे मनहूस समझते हं। मादा उल्लू अपने अंडे मई से जुलाई तक देती है। अंडे गिनती में तीन या चार होते है और उनका रंग सफेद होता है। उल्लू अपना घोंसला पुरानी इमारतों के खंडहरों, पेड़ों के खोखले तनों और सुराखों में बनाना पंसद करता है। उल्लू फसल को हानि पहुंचाने वाले कीड़ों को मारकर खा जाता है। इसलिए यह किसानों का मित्र पक्षी भी है। भारत के अतिरिक्त उल्लू संसार के लगभग सभी देशों में मिलता है। सुभाष बांसल(प्रैसवार्ता)

ग्लोबल वार्मिंग:दस्तक प्रलय की

आजकल जलवायु बदलाव विश्व के तापमान में वृद्धि गंभीर पर्यावरणीय समस्या के रूप में उभर कर सामने आए हैं। वैज्ञानिकों ने इस समस्या का ग्लोबल वार्मिंग नाम दिया है। धरती को बढ़ता तापमान समूचे संसार एवं मानव जाति के लिए खतरानाक सिद्ध हो रहा है। वर्तमान में जलवायु तथा मौसम में भंयकर उथल-पुथल इसी के कारण मची हुई है। ग्लोबल वार्मिंग के फलस्वरूप ग्लेशियर पिघलते जा रहें हैं। ठंड में गर्मी और गर्मी में बारिश बाढ़ का प्रकोप झेलना पड़ रहा है। मौसम में हो रहे इस बदलाव से छोटे-बड़े जीव-जन्तु पेड़ पौधे सभी दुष्प्रभावित हो रहे हैं।वायु प्रदूषण, ध्वनी प्रदूषण मृदा प्रदूषण, जैव प्रदूषण आदि ने मिलकर पूरे पर्यावरण को प्रदूषित कर दिया है और आज यही जीवनदायी तत्व जीवन घातक बन गए हैं। वैज्ञानिकों को आशंका है कि परमाणु युद्ध या धरती से क्षुद्रग्रह के टकराने से जितनी तबाही हो सकती है, उतनी तबाही ग्लोबल वार्मिंग से भी संभव है। हमारे देश में वर्ष 1998 का वर्ष पिछले 50 वर्षो में सर्वाधिक गर्म रहा, जिसमें 26 दिन की लू में करीब 2500 लोगों की जान चली गई। पूरे विश्व में इसका असर देखा गया। यह धरती के मौसमी इतिहास की सबसे तेज गर्मी थी। वैज्ञानिकों का मानना है कि अगले 50 वर्शो तक पर्यावरण प्रदूषण की यही गति बनी रही तो महाप्रलय सकता है, क्योंकि वायु मंडल में निरंतर बढ़ती कार्बन डाईऑक्साइड गैस से पृथ्वी के वायुमंडल का तापमान 3 से 4 डिग्री सेंटीग्रेट बढ़ जाएगा जो पौध घर प्रभाव को नष्ट तो करेगा ही साथ ही ग्लेषियरों के पिघलने से समुद्र का जल स्तर बढ़ जाएगा। ग्लोबल वार्मिंग के कारण आर्कटिक हिम सतह की मोटाई 1950 के बाद आश्चर्यजनक रूप से 15 प्रतिशत घट चुकी है। माउंट केन्या का सबसे बड़ा ग्लेशियर 92 प्रतिशत खत्म हो चुहा है। गंगा को जीवन देने वाले ग्लेशियर पर भी संकट के बादल मंडरा रहे हैं। विश्व का तीसरा सबसे बड़ा यह ग्लेशियर 30 मीटर प्रतिवर्ष की तीव्र रफ्तार से सिकुड़ता जा रहा है, अब तक यह 260 वर्ग किलोमीटर तक सिकुड़ गया है, सुविख्यात पर्यावरणविद् डॉ. सैयद इकबाल हुसैन और डॉ. अरुण शास्त्री के सर्वेक्षण से पता चलता है कि यह मौमुखी ग्लेशियर निरंतर घट रहा है। इस प्रकार स्पष्ट है कि दुनिया भर के ग्लेशियरों एवं बर्फ के पिघलने से समुद्रों का जल स्तर निरंतर उठता जा रहा है। भारत में इसका पहला प्रभाव कच्छ पर होगा, जो हमेशा के लिए समुद्र में समा सकता है और आशंका है कि सुंदर वन एवं लक्षद्वीप भी सदा के लिए विष्व मानचित्र से लुप्त हो जाएंगे। ग्लोबल वार्मिंग के समाधान हेतु कई अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन, समझौते एवं संधिया भी हो चुकी हैं, परंतु कोई सार्थक निष्कर्ष नहीं निकल पा रहा है। यह विश्वव्यापी समस्या दिनों दिन उग्र होती जा रही है। लेकिन ऐसा नहीं है कि इसके समाधान के समस्त द्वार बंद हो गए हों। वैज्ञानिकों के अनुसार ग्लोबल वार्मिंग का कारण ग्रीन हाउस गैसें हैं, पेड़ पौधे इन गैसों को सोखने में मुख्य भूमिका निभाते हैं। यदि वृक्षारोपण पर बल दिया जाए, तो इस संकट से काफी कुछ निपटा जा सकता है। निरंतर बढ़ रहे पर्यावरण प्रदुषण को कम करने हेतु आवश्यक कदम उठाने होंगे। हम सभी पर्यावरण को प्रदूशित करने से बचें एवं उसके प्रति संवेदनशील बनें। समय रहते धरती को बचाने के लिए सारे प्रयास किए जाएं अन्यथा वह दिन दूर नहीं जब महाप्रलय जाएगा और पृथ्वी से मानव का नामो-निशान मिटकर यह एक बेजान ग्रह बनकर रह जाएगा। -राम अवतार कौशिक (प्रैसवार्ता)

Wednesday, December 23, 2009

सबसे अधिक गधे फतेहपुर में

सीकर(प्रैसवार्ता) रेगिस्तान का जहाज कहलाने वाला ऊंट का अस्तित्व अब मशीनीकरण के कारण खतरे में पड़ गया है। पशुपालन विभाग के तमाम दावों के बाद भी हर साल ऊंटों की संख्या घट रही है। वैज्ञानिकों ने भले ही ऊंटनी के दूध से डायबिटीज का इलाज ढूंढ निकाला हो या केमल मिल्क से डेयरी खुलें। इन सबके बाद भी सरकार के पास ऊंटों के लिए सरंक्षण के लिए कोई योजना नहीं है। माल ढोने रेगिस्तानी इलाकों में यातायात की बेजोड़ सवारी के रूप में ख्यात ऊंटों की संख्या शेखवाटी जनपद में साल दर साल घटती जा रही है। यातायात हो कृषि कार्य, सभी जगह आधुनिक संसाधनों का उपयोग होने लगा है, जो समय की बचत करने के साथ सस्ता भी है। इस मामले में सीकर, झुंझुनूं, चुरू तीनों ही जिलों की स्थिति समान है। आंकड़ें साक्षी हैं कि साल दर साल ऊंटों की संख्या घटती जा रही है। सीकर, झुंझुनूं चुरू तीनों जिलों की स्थिति समान है। सीकर जिले में वर्ष 1992 में 29291 ऊंट थे जो पांच साल के अंतराल के बाद 1997 में घटकर 27552 रह गए। इसी प्रकार झुंझुनूं जिले में वर्ष 1991 में 32667 ऊंट थे जो 1997 में घटकर 30519 रह गए। चुरू जिले की भी यही स्थिति है। वहां 1992 में 83128 ऊंट थे, लेकिन पांच साल बाद 1997 में इनकी संख्या 64 हजार 764 रह गई। यह स्थिति करीब दस साल पहले की है। इसके बाद की स्थिति तो और भी चौंकाने वाली है। हालांकि ताजा आंकड़ें तो नहीं है लेकिन पीछे के दस सालों में शेखवाटी जनपद में तेजी से विकास हुआ है। आधुनिक संसाधनों में बेहताश बढ़ोतरी हुई है। खेतीबाड़ी यातायात के काम कुछ सालों पहले काम आने वाले ऊंट अब तो नजर आने से भी रह गए हैं। जिले में वर्ष 2003 में श्रीमाधोपुर तहसील में सबसे ज्यादा 5565 ऊंट थे जिनकी संख्या गिरकर 2008 में 3419 रह गई। इसी प्रकार सीकर में 2003 में 3787 ऊंट थे जिनकी संख्या 2008 में 3695 रह गई। दांतारामगढ़ में 2003 में 3393 ऊंटों की संख्या थी जो 2008 में गिरकर 2504 रह गई। लक्ष्मणगढ़ में 2003 में 2955 ऊंट थे जो 2008 में 2581 रह गए। नीमकाथाना में 2003 में 2462 ऊंटों की संख्या थी जो गिरकर 2008 1680 रह गई। इसी प्रकार फतेहपुर में 2003 में 2176 थी जो गिरकर 2008 में 1607 ऊंटों की संख्या रह गई। अगर ऊंटों की गिरती संख्या पर गौर किया जाए तो बहुत संभावना है कि रेगिस्तान का जहाज ऊंट 2023 में जिले से लुप्त हो जाएगा। ऊंटों की संख्या घटने के पीछे एक बड़ा कारण यह सामने आया है कि खेती बाड़ी में ऊंट की जगह ट्रैक्टर का उपयोग होने लगा है। परंपरा से हटकर लोग अब ऊंट की बजाय ट्र्रैक्टर खरीदना ज्यादा पसंद करते हैं। इसके अलावा सामान ढोने में गधा गाड़ी के प्रचलन में रहने से जिले में गधों की संख्या 1992 के बाद बढ़ी है। शहरी क्षेत्रों में छोटा-मोटा सामान इधर-उधर ले जाने के लिए गधा गाड़ी का प्रचलन बढ़ा है। वर्ष 1997 में सीकर जिले में जहां 2307 गधे थे वहीं पांच साल बाद 1997 में बढ़कर इनकी संख्या 3122 हो गई। जिले में सबसे कम गधे लक्ष्मणगढ़ तहसील में हैं वहां 1997 के आंकड़ों के मुताबिक 307 गधे थे जबकि जिले में सर्वाधिक गधे फतेहपुर तहसील में 1117 थे।

नृत्य और संगीत से भी हो रहा है इलाज

आज के मानव का जीवन कार्य व्यस्तता, दौड़-धूप, प्रतिस्पर्धा और आपाधापी का पर्याय बन चुका है। आराम और शांति के क्षण विरले ही उपलब्ध हो पाते हैं। इसी व्यस्त किन्तु आराम परस्त जीवन की देन है उच्च रक्तचाप, हृदय रोग, तनाव, मोटापा तथा अन्य बीमारियां। कैसा हो यदि इन सब बीमारियों के इलाज के लिए दवाइयों के स्थान पर अथवा उनके साथ-साथ नृत्य और संगीत का प्रयोग किया जाए? निश्चय ही नृत्य और संगीत का दवा के रूप में प्रयोग हम सभी को भाएगा। पश्चिमी देशों में लोग शरीर को हल्का-फुल्का बनाए रखने के लिए कई-कई घंटों नृत्य का अभ्यास करते हैं। शरीर को छरहरा बनाए रखने की यह पद्धति भूतपूर्व सोवियत संघ के गणराज्यों में बहुत ही प्रसिद्ध है। इसके लिए संगीत की सुर-ताल और लहरियों के साथ-साथ लोग तालाब में तैरने, साइकिल चलाने, लंबे समय तक दौडऩे आदि का अभ्यास करते हैं। चूंकि इस प्रकार के व्यायामों के लिए शरीर को अधिक मात्रा में आक्सीजन की जरूरत होती है इसलिए इस प्रकार के व्यायामों को वातापेक्षी व्यायाम की संज्ञा दी जाती है। इस प्रकार के व्यायामों के लिए वातावरण का सृजन संगीत द्वारा किया जाता है जो हर व्यक्ति को उसकी क्षमतानुसार व्यायाम करने के लिए उत्साहित करता है। इससे प्राणवायु शरीर के प्रत्येक अंग की कोशिकाओं में पहुुंचकर उनको साफ कर देती है, जिससे शरीर में चुस्ती और ताजगी का अनुभव होता है। यह भी जरूरी है कि वातपेक्षी व्यायाम करते समय चेहरे पर मुस्कान हो। मुस्कान चेहरे का व्यायाम है। दूसरी ओर हंसने से हमारे भीतर ऐसे हारमोन स्रावित होते हैं जो हमें स्वस्थ बनाए रखते हैं। चेहरे पर यह मुस्कान आती है मनचाहे संगीत से। इस प्रकार के व्यायाम में कोई नया आयाम नहीं है। इसमें शरीर को मोडऩा, बैठना, कूदना, बाहों को आगे-पीछे मोडऩा और शरीर को मोडऩा ही शामिल है। इसे करने के लिए जरूरी नहीं कि इन्हें पूर्वा नियम-कानूनों के साथ किया जाए। उन्मुक्त ढंग से किया गया नृत्य भी फायदेमंद होता है। हृदय की भावनाओं तथा संवेगों को प्रकट करने का माध्यम संगीत है। संगीत सुनना तथा उसका अभ्यास करना दोनों ही तनाव से ग्रसित मानव की शिराओं में शिथिलता प्रदान करता है। यों भी संगीत में डूबा व्यक्ति चाहे कुछ ही समय के लिए ही सही अपने दु:ख-विशाद को भूल जाता है जिससे मस्तिष्क तथा शरीर को तनाव से मुक्ति मिलती है, आराम व सुकून मिलता है। वैज्ञानिकों ने भी इस बात की पुष्टि की है कि संगीत मानसिक, शारीरिक तनाव तथा व्याधियों को दूर करने में सहायक है। चिकित्सा शास्त्र के प्राचीन ग्रंथों में भी रोगों के उपचार में संगीत की महत्ता का वर्णन मिलता है। आधुनिक समय में संगीत द्वारा रोगों के उपचार का चलन बढ़ता जा रहा है। उच्च रक्तचाप, हृदय रोग तथा विभिन्न मानसिक रोगों के उपचार के लिए संगीत एक अचूक औषधि है। इनके अतिरिक्त बुखार, शीतप्रकोप आदि के उपचार के लिए भी संगीत का सहारा लिया जाता है। अनेक चिकित्सकों ने आपरेशन करते समय भी रोगी को दवाइयों से बेहोश करने की बजाए संगीत सुनवाना अधिक उचित माना है। उनका मानना है कि संगीत की मधुर तरंगों में रोगी इतना मग्न हो सकता है कि शल्य चिकित्सा के असहनीय दर्द की ओर उसका ध्यान ही नहीं जाता। संगीत द्वारा अन्य रोगों के उपचार के लिए निरंतर अनुसंधान चल रहे हैं। संगीत केवल हम मानवों को ही रोगरहित नहीं करता अपितु यह पौधों तथा जानवरों के स्वास्थ्य को भी प्रभावित करता है। यह सिद्ध हो चुका है कि संगीत श्रवण से गायों में दुग्ध विसर्जन की मात्रा बढ़ जाती है साथ ही संगीत का पौधे के विकास पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। स्वास्थ्य तथा नृत्य व संगीत हमकदम हैं इसमें कोई दो राय नहीं है। परन्तु साथ ही यह भी जरूरी है कि नष्त्य या संगीत रोगी की पसंद का हो। व्यक्ति विशेष की प्रवष्ठित तथा स्थिति के अनुरूप भी संगीत अथवा नृत्य का चयन किया जा सकता है। यह जरूरी नहीं कि नृत्य या संगीत शास्त्रीय नियमों से बंधे हों। -मनमोहित (प्रैसवार्ता)

भ्रूण हत्या के खिलाफ अलख जगाने निकली निशा

कैथल(प्रैसवार्ता) यदि निशा जैसी हिम्मत और जज्बा प्रत्येक लड़की दिखाए तो समाज से कन्या भ्रूण हत्या को रोका ही नहीं जा सकता, बल्कि इसे जड़ से समाप्त किया जा सकता है। कैथल के इंदिा गांधी महिला महाविद्यालय में बीए द्वितीय वर्ष की छात्रा निशा वर्मा ने अपने दम पर अब तक 1500 लोगों को कन्या भ्रूण हत्या के खिलाफ शपथ दिलवाकर उनसे हस्ताक्षर लिए हैं। भ्रूण हत्या पर आयोजित भाषण मुकाबलों में वह कई अवार्ड भी जीत चुकी है। अब उसका लक्ष्य वर्ष 2010 में दो हजार लोगों को अकेले ही इस पुनीत कार्य में आहुति डलवाने का है। निशा से जब कालेज में प्रथम वर्ष के दौरान कन्या भ्रण हत्या पर भाषण तैयार करने को कहा गया, जिसे उसने अपने जीवन में आत्मसात कर लिया है। उसे कन्या भ्रूण हत्या पर भाषण के लिए कई पुरस्कार भी मिले हैं। ''प्रैसवार्ता'' से बातचीत में निशा ने बताया कि कन्या भ्रूण हत्या के बारे में गहराई से जानने पर उसे इस जघन्य अपराध का एहसास हुआ। इसके बाद उसने जिले के साथ-साथ बाहर जाकर भी एक हस्ताक्षर अभियान चलाया और अकेले अपने दम पर उसने प्रथम वर्ष 1500 लोगों को जागरूक कर उनके हस्ताक्षर लिए हैं। निशा बताती है कि उसने अपने कालेज में ओयाजित मुकाबले में प्रथम स्थान हासिल करने के बाद आरकेएसडी कालेज में आयोजित जिला स्तरीय भाषण प्रतियोगिता में प्रथम स्थान पाया। इसके बाद अंबाला में प्रदेशस्तरीय भाषण प्रतियोगिता में इसी विषय में उसने प्रथम, करनाल में आयोजित भाषण प्रतियोगिता में उसने प्रथम स्थान हासिल किया। इसके बाद इसी वर्ष सितंबर माह में शिमला में भाषण प्रतियोगिता के राष्ट्रीय मुकाबले में उसने प्रथम स्थान हासिल किया। कालेज की प्रबंधक समिति द्वारा भी उसे कन्या भ्रूण हत्या के संबंध में किए गए कार्य के लिए सम्मानित किया गया है। निशा ने बताया कि उसका लक्ष्य अब इस बुराई की समाप्ति के लिए आजीवन संघर्ष करना है। नववर्ष 2010 में वह दो हजार लोगों को व्यक्तिगत तौर पर संपर्क कर उनके हस्ताक्षर लेंगी और लोगों को जागरूक करेंगी। एलआईसी में बतौर एजेंट कार्यत शंकर वर्मा की पुत्री निशा का कहना है कि उसके परिजन उसे लगातार इस बुराई से लडऩे की प्रेरणा दे रहे हैं और कालेज प्राचार्य डा. साधना ठुकराल उसका मार्गदर्शन कर रही हैं। प्रत्येक लड़की को चाहिए कि वह कन्या भ्रूण हत्या के खिलाफ आवाज उठाए।

यहां दूध बेचना यानी मुसीबत को बुलाना

बिजरियागंज(प्रैसवार्ता) जिले में एक ऐसा भी गांव है जहां दूध नहीं बिकता। इतना ही नहीं इस गांव का कोई भी व्यक्ति गांव से बाहर भी दूध का कारोबार नहीं करता। यह गांव है बिलरियागंज ब्लाक का कोठिया। गांव के बुजुर्ग बताते हैं कि गांव को कीर का श्राप लगा हुआ है, जिसने भी दूध बेचा उसके पशु की मौत हो गई। अब कोई भी व्यक्ति दूध बेचना तो दूर बेचने की भी नहीं सोचता। करीब 900 की आबादी वाले कोठिया गांव में औसतन 3,000 लीटर दूध रोज उत्पादन होता है। दूध बेचने को लेकर सबके मन में एक ही डर है कि कहीं उनका पशु मर जाए। इस संबंध में पूर्व प्रधान विश्वनाथ यादव बताते हैं कि उनके पट्टीदार हरिलाल यादव ने आज से 30 साल पहले दूध बेचना शुरू किया तो उनकी भैंस गई, लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और फिर दूध बेचने की ठान ली और गांव छोड़कर आजमगढ़ जिला मुख्यालय स्थित रोडवेज पर रहने लगे। यहां पर उन्होंने दो भैंसें खरीदीं और एक बार फिर दूध बेचना शुरू किया। कुछ ही दिन बाद उनकी दोनों भैंसें मर गईं। उनकी आर्थिक व्यवस्था चरमरा गई। इसके बाद वे मुंबई में रहने लगे। गांव के बुजुर्ग बताते हैं कि रूपायन यादव ने बिहार के आसनसोल में डेयरी खोलकर दूध बेचना शुरू किया तो वहां उनके सारे पशुओं की मौत हो गई। इसके बाद गांव के लोगों ने दूध का धंधा बंद कर दिया। गांव के 70 वर्षीय तिलकधारी यादव ने बताया कि बाप-दादा बताते रहे हैं कि सैंकड़ों वर्ष पूर्व एक फकीर ने एक घर में दूध मांगा तो घर की महिला ने दूध होते हुए फकीर से यह बोल दिया कि घर में दूध नहीं है।

गांव के कोल्हुओं से देसी गुड़ की महक गायब

जींद(प्रैसवार्ता) सर्दी का मौसम शुरू होते ही गांवों में किसान कोल्हू लगाकर गन्ने से देशी गुड़ तैयार करते थे, लेकिन बदलते हुए परिवेश में अब तो किसी गांव में कोल्हू चलता दिखाई देता है और ही कोल्हू में बनने वाले गुड़ की महक से वातवारण में मिठास घुलती है। गन्ने की फसल कम होने के कारण हरियाणा का देशी गुड़ अब बहुत कम जगहों पर ही मिलता है। उत्तर प्रदेश से व्यापारी गुड़ लाकर हरियाणा में बेचते हैं। उसका स्वाद इतना बढिय़ा नहीं होता है। जितना की गांव के कोल्हू के गुड़ का अच्छा स्वाद होता था। सबसे बड़ी बात तो यह थी कि कोल्हू के गुड़ की बिक्री करके किसान अपने परिवार का साल भर का खर्चा चलाता था। क्योंकि गुड़ को ही नकदी की फसल माना जाता था। गेहूं, चना समेत रबी की फसलों की पैदावार तो इतनी की जाती थी कि घर के खाने-पीने का काम चल जाए। लेकिन गुड़ ही किसान की आर्थिक व्यवस्था का आधार होता था। जिस किसान के पास ज्यादा गुड़ वह उतना ही आर्थिक रूप से बड़ा जमीदार माना जाता था। करीब दस-पंद्रह साल पहले तक सर्दी का मौसम शुरू होते ही गांवों की बणियों में कोल्हू लगने शुरू हो जाते थे। अगर कोई बड़ा जमीदार होता तो वह अपना अलग से कोल्हू चलाता था, नहीं तो तीन-चार या इससे अधिक किसान मिलकर अपना सांझे का कोल्हू चलाते थे। कोल्हू का कार्य एक भाइचारे का प्रतीक माना जाता था। हरियाणा एक भी कहावत थी कि सांझे के कोल्हू जिस्सा स्वाद कोन्या। यानी की कोई काम अगर मिल जुल कर किया जाए तो उसको करने में काफी आसानी होती थी। संयुक्त परिवार कम होते गए और कोल्हू का स्थान सहकारी चीनी मिलों ने ले लिया। लेकिन अब तो चीनी मिलों के सामने भी पिराई सत्र कब शुरू करें और कब खत्म करने की नौबत पिछले कई साल से खड़ी है। किसानों ने गन्ने की अपेक्षा धान गेहूं की बिजाई को ज्यादा बढ़ावा दिया है। कुछ साल पहले जींद चीनी मिल के तहत आने वाले एरिया में गन्ने का रकबा 70-80 हजार हेक्टेयर में होता था। इतने रकबा होने के कारण शूगर मिल भी अपना पिराई सत्र पूरा आसानी से पूरा कर लेता था और किसान भी अपने कोल्हू में गुड़, शक्कर बनाते थे, लेकिन गन्ने के रकबे में कमी रही है। वर्ष 2006-07 में जींद में गन्ने का रकबा 14333, वर्ष 2007-08 में 17194, वर्ष 2008-09 में 5133 हेक्टेयर में गन्ने की बिजाई हुई थी।
कोल्हू चलाने को संयुक्त परिवार जरूरी:गांव हैबतपुर के धर्मचंद, बीबीपुर के रणधीर सिंह, रायचंदवाला के होशियार सिंह जैसे बुजुर्ग किसान कहते हैं कि कोल्हू चलाने के लिए संयुक्त परिवार की आवश्यकता होती है। क्योंकि कोल्हू में कई प्रकार के कार्य करने होते हैं। संयुक्त परिवार रहने के कारण जो किसान गन्ना की फसल पैदा भी करता है वह चीनी मिल में गन्ना डालता है। किसानों ने यह भी कहा कि अब तो गन्ने की और किसानों का रुझान वैसे भी नहीं रहा है। क्योंकि गन्ना फसल से साल में एक बार आदमनी होती है, जबकि अन्य फसलों से साल में दो बार आमदनी हो जाती है।

Tuesday, December 15, 2009

अभिव्यक्ति और प्रस्तुति का अनूठा हस्ताक्षर डा.विष्णु सक्सैना

पवन पंडि़त पत्रकार की खास रिपोर्ट
गीत साहित्य की बहुत कोमल विधा है। इसलिये समय-समय पर इसकी कोमलता के साथ छेडछाड होती रही है। एक वह समय था कि कवि सम्मेलन के मंच पर गीत हस्ताक्षरों का प्रादुर्भाव हुआ करता था और एक दो हास्य कवियों को चटनी के बतौर आमंत्रित कर लिया जाता था। धीरे-धीरे ये चटनी गीत जैसे ज़ायकेदार सुपाच्य भोजन को ही चट करने लगी और गीत की स्थिति बडी दयनीय होती चली गयी। उस काल के गीत विधा के शीर्षस्थ रचनाकारों में कुछ तो इस लडाई को लड ही न सके, कुछ ने कमज़ोरी छुपाते हुये अपने को गज़ल की ओर मोड लिया, कुछ ने लडाई लडी भी तो अकेले पड जाने के कारण समाप्त हो गये। परिणामत: हास्य का झंडा बुलंद होता चला गया। बलबीर सिंह रंग, रमानाथ अवस्थी, वीरेन्द्र मिश्र, नीरज, भारत भूषण और डा. कुँवर बेचेन के बाद एक बहुत बडा अंतराल आया... एक बार को तो एसा लगने लगा कि गीत कहीं मंच से समाप्त न हो जाये। तब 80 और 90 के दशक में गीत की चिंगारी लेकर एक ऐसा युवा गीतकार मंच पर आया जिसे सुन कर सभी हतप्रभ रह गये, धीरे-धीरे इस चिंगारी ने मशाल का रूप ले लिया। प्रकृति परिवर्तन माँगती है और यह परिवर्तन ही आज हिन्दी कवि सम्मेलनों की आवश्यकता बन गया है। इस कवि के स्वर में जितनी कशिश है उतने ही अंतस तक स्पर्श करने वाले शब्द----
हमने देखें हैं पत्थर पिघलते हुये,
शीत जल में से शोले निकलते हुये,
तुम न बदलोगी ये कैसे विश्वास हो
हमने देखे हैं मौसम बदलते हुये,
इस बदले हुये मौसम में अपने इंद्रधनुषी गीतों की छटा बिखेरने वाले इस गीतकार का नाम है डा. विष्णु सक्सैना । जो हाथरस जिले की सिकन्दराराऊ तहसील के निवासी हैं। प्रायमरी से लेकर इंटर तक की शिक्षा यहीं से लेने के बाद स्नातकीय शिक्षा के लिये राजस्थान जाना पडा। उदयपुर से चिकित्सा शास्त्र में प्रथम श्रेणी की डिग्री ले यह अपने ही नगर में आकर निजी क्लीनिक में रोगियों का उपचार कर रहे हैं। इतनी व्यस्तताओं में से जो भी खाली समय बचता है उसे कविता के रस से भर लेते हैं।
पेशे से चिकित्सक डा. विष्णु सक्सैना अपने अन्दर एक नाज़ुक सा, कोमल सा दिल भी रखते हैं इसलिये इनकी कविता में दर्द भी है और उसका इलाज भी। डा. सक्सैना को कविता विरासत में मिली है। इनके दादा श्री चन्द्रभान शशिरवि तो जिकडी भजनों के सिद्ध कवि थे, उन्होंने न जाने कितनी गज़लें और लोकगीत लिखे। ग्रामीण परिवेश में जीवन यापन होने के कारण उनकी समस्त रचनाओं में गाँव की मिट्टी की सोंधी-सोंधी गंध भी समाहित थी। पिता श्री नारायण प्रकाश और माँ श्रीमती सरला सक्सैना के सुसंस्कारित प्रयासों के प्रतीक डा. विष्णु के कविता के मंच पर आने से गीत को पुनर्जीवन तो मिला ही है साथ ही श्रोता जिस मानसिकता से हास्य व ओज की कविताओं को सुनता था, आज उतने ही मनोयोग से उनके गीतों को सुनने के लिये लालायित होता है। दिनों दिन बढती लोकप्रियता का ही परिणाम है कि अपनी छोटी सी उम्र में लगातार ऊँचाइयाँ छू रहे हैं। इसलिये आज उन्हें आकाशवाणी, टीवी, तथा स्तरीय पत्र पत्रिकाओं में यथोचित सम्मान मिल रहा है।
मुस्कुराहट के पन्ने पलट दो ज़रा
बाँच लूँगा सभी प्यार की पोथियाँ,
नेह की बात होगी निबन्धों में जब
कसमसायेंगीं आपस की अनुभूतियाँ,
कविता तो एक तपस्या की तरह है, जिसमें सब कुछ भूल कर ही मोक्ष की प्राप्ति होती है। खुद को डुबोना पडता है तभी जीवन का वास्तविक आनन्द आता है। विष्णु जी की रचनाओं में भी कुछ ऐसी ही अनुभूतियाँ हैं, प्रेम की सूक्ष्म संवेदनाओं की विवेचना है---
क्यूँ बिछाकर दुपट्टा हरी घास पर
मेरे सपनों को उसमें समेटा बता?
एक चटका हुआ आँसुओं का कलश
काँपते हाथ से क्यूँ समेटा बता?
मन करता है कि बस विष्णु सक्सैना पढते रहें और हम सुनते रहें। इनके प्रेम गीतों में विशेष बात ये है कि चाहे वह संयोग पक्ष हो या वियोग पक्ष, कहीं भी मर्यादा का उल्लंघन नहीं होता।
थाल पूजा का लेकर चले आइये
मंदिरों की बनावट सा घर है मेरा।
* * * *
लाँघना ना कभी देहरी प्यार में
चाहे मीरा को मोहन मिले न मिले।
साहित्य साधना के लिये दृढता, धेर्य और त्याग की भी ज़रूरत होती है। ये सब इनकी कविताओं में पढने और सुनने से दिखाई देता है। यही कारण है कि इनके शब्द आत्मा की गहराई से निकल कर सशक्त प्रस्तुति के माध्यम से जब श्रोताओं के सामने आते हैं तो बरबस ही मुँह से आह और अन्दर से वाह निकलने लगते है---
वंदनवारें तो बांध नहीं पाया पर
चौखट पर दोनों आँखें बंधी हुयी हैं,
तुम आओगे तो एक फूल तोडोगे
सारी कलियाँ खिलने से रुकी हुयी हैं,
इनकी कविताओं में मात्र नायक नायिकाओं के प्रेम प्रसंग ही नहीं अपितु उनके माध्यम से देश की समस्याओं को भी हल करने की कोशिश की गयी है।
मस्ज़िद हैं आप तो मुझे मन्दिर ही मान लो,
हो आयतों में तुम मुझे श्लोक जान लो,
कब तक सहेंगे और रहेंगे अलग-अलग
मैं पूजूँ तुम्हें तुम मेरे दिल में अज़ान दो,
ये कहते हैं कि कवि और श्रोताओं के बीच की दूरी को कम करने के लिये हमें अपने तमाम पूर्वाग्रहों को छोड कर आम बोल चाल की भाषा का ही प्रयोग करना चाहिये जिससे श्रोता आसानी से आपकी बात आत्मसात कर लेगा, तभी कला को पूर्ण सम्मान मिलेगा।
इस व्यावासायिकता के युग में सभी गुटबन्दियों से अलग डा. सक्सैना ने हमें बताया कि उनके 'मधुवन मिले न मिले' 'स्वर अहसासों के 'खुश्बू लुटाता हूं' नामक गीत संग्रह तथा 'प्रेम कविता' 'तुम्हारे लिये' नामक सीडी बाज़ार में उपलब्ध हैं। कवि सम्मेलनों की घटती लोकप्रियता के बारे में वे कहते हैं कि इलेक्ट्रानिक मीडिया तथा अश्लील फूहड हास्य ने अच्छे श्रोता कवि सम्मेलनो से दूर कर दिये हैं।
गत दिनों अनेक सम्मानों से सम्मानित विष्णु जी ओमान, अमेरिका, इसराइल, थायलेंड, दुबई, हांगकांग, नेपाल में भी अपने रसीले गीतों की फुहार छोड कर आये हैं। साँवला सलोना, हरदम मुस्कराता, सुदर्शन तथा विलक्षण प्रतिभा का ये युवा कवि डा. विष्णु सक्सैना आज हिन्दी कविता की धडकन बन गया है। उसके प्रशंसकों की असीम शुभ कामनायें यदि फलीभूत हो गयीं तो भविष्य का ये इकलोता गीतकार होगा जिसे देख कर आंखें तृप्ति का और मन अतृप्ति का आभास करेगा--
आओ मेंहन्दी महावर की शादी करें,
उम्रभर साथ रहने का आदी करें,
फूल से पंखुरी अब न होगी अलग,
सारे उद्यान में ये मुनादी करें,
हमको जितना दिखा- सिर्फ तुमको लिखा
अब ये पन्ना यहीं मोड दें---------------

Friday, December 11, 2009

ब्राह्मीपान से हजारों छात्र/छात्राएं ले रहे है बौद्धिक लाभ

(ग्राम खमरा में प्रतिवर्ष हो रहा है, देश का एकमात्र अभिनव आयोजन)
छिन्दवाड़ा(प्रैसवार्ता) सरस्वती जयंती बसंत पंचमी के उपलक्ष्य पर भागवत भूषण पं. रामविशाल शुक्ल के मार्गदर्शन पर सरस्वती महोत्सव एवं ब्राह्मीपान समिति खमरा वि. ख. बिछुआ द्वारा आयोजित देश के एक मात्र अनुठे ब्राह्मीपान कार्यक्रम के जरिये इस वर्ष भी पॉंच हजार से अधिक छात्र/छात्रायें अपनी बौद्धिक क्षमता की वृद्धि का लाभ लेने खमरा में जुटेंगे । जिले के विकासखण्ड बिछुआ के ग्राम खमरा में प्रतिवर्षानुसार आयोजित इस कार्यक्रम के संस्थापक पं. रामविशाल शुक्ल ने बताया कि विगत दस वर्षो से चला आ रहा यह कार्यक्रम अपने आप प्रदेश ही नही अपितु देशभर का इकलौता अनुठा अभिनव कार्यक्रम है जिसकी ख्याति के चलते हर वर्ष इस पुनीत पर्व बसंत पंचमी सरस्वती जयंती में इसका लाभ लेने वालों की संख्या हजारों में बढ़ती जा रही है । कार्यक्रम के प्रारंभ में जहॉं इस कार्यक्रम में सम्मिलित लोगों की संख्या 250 थी । वही अब लगभग 4 से 5 हजार के करीब हो चुकी है । वेदों में उल्लेख है: पं. श्री शुक्ल ने बताया है कि शास्त्रों एवं वेदों में सरस्वती का श्री विग्रह शुक्ल वर्ण है यह परम सुन्दरी देवी सदा हॅंसती रहती है इसके परिपुष्ठ विग्रह के सामने करोड़ो चन्द्रमा की प्रभा भी तुच्छ है ये विशुद्ध चिन्हमय वस्त्र पहने है इनके एक हाथ में वीणा और दूसरे हाथ में पुस्तक । सर्वोत्तम रत्नों से वने हुए आभूषण इन्हें सुशोभित कर रहे है । ब्रम्हा, विष्णु, शिव प्रभृति प्रधान देवताओं तथा सुरगणों से सुपूजित है । इन्हें सुगंधित सफेद पुष्प और सफेद चंदन अर्पण करना चाहिए । श्वेत पुष्पों की माला और भूषण भगवती को चढ़ावे और भगवती सरस्वती का ध्यान परम सुखदायी है तथा धर्म का उच्छेद करने वाला है माघ शुक्ल पंचमी अर्थात वंसत पंचमी सरस्वती जयंती विद्यांरभ की मुख्य तिथि है उसदिन पूर्व अपरान्ह काल में पूर्वाहन पवित्र रहे स्नान और नित्य क्रिया पश्चात शोडशेपचार से मॉं भगवती की पूजा करे । नैवेद्य में तिल के लड्डु, मिश्री,, सफेद रंग की मिठाई, गेहॅं के आटे में तले पदार्थ, नारियल, पका हुआ केला, धान का लावा आदि विशेष रूप से चढ़ावे । सरस्वती को मिला शाप बना वरदान: लक्ष्मी सरस्वती गंगा तीनों ही भगवान श्री हरि की भार्या है । एक बार सरस्वती को यह संदेह हो गया कि श्री हरि मेरी अपेक्षा गंगा से अधिक प्रेम करते है । तब उन्होंने श्री हरि को कड़े शब्द कहे फिर वे गंगा को क्रोध करके कठोर बरताव करने लगी तब लक्ष्मी ने उन्हें रोक दिया । इस पर सरस्वती ने लक्ष्मी को गंगा का पक्ष करने वाली मानकर श्राप दे दिया तुम निश्चय ही वृक्षरूपा और नदी रूपा हो जाओंगी । तब गंगा ने सरस्वती को श्राप दे दिया की वह भी नदी रूपा और वृक्षरूपा हो जाये । गंगा की बात सुनकर सरस्वती ने भी उन्हें वही श्राप दे दिया श्राप से लक्ष्मी पदमावती नदी और तुलसी वृक्ष के रूप में धरती के रूप में अवतरित हुई । इसी प्रकार गंगा भी भागीरथी और धात्री वृक्ष के रूप में अवतरित हुई। सरस्वती कला के अंश से नदी के रूप में भारत वर्ष में पधारी आधे अंश से ब्रम्हा के अंश में पधारी तथा ब्राह्मी वृक्ष रूपणी और पूर्ण अंश से स्वयं भगवान के पास रही । ब्राह्मी सेवन प्रयोग: कण्व शाखा के अनुसार जो व्यक्ति माद्य शुक्ल पंचमी सरस्वती जयंती के दिन सरस्वती का शोडशोपचार से पूजन कर सरस्वती कवच धारण करने पश्चात ब्राह्मीपान धारण करता है उसकी मेधा बौद्धिक क्षमता में चमत्कारित ढ़ंग से वृद्धि होती है । माद्य कृष्ण चतुर्दशी से माद्य शुक्ल पंचमी तक ब्राह्मी पान शुभ फलदायी होता है ।
अद्रक - भद्रक, पीतरसं, वच बाकुचि, ब्राह्मी, सहाघृतम
माद्य चतुर्दश कृष्ण दिनम् अस् बोलत कोकिल नाद रतम
कणाद, गौतम, कण्व पाणिनी शाकटायन, दक्ष और कात्यायन आदि ऋषियों ने सरस्वती कवच धारण पश्चात ब्राह्मीपान करके ही गं्रथों की रचना में सफल हुये । सरस्वती कवच के ऋषि प्रजापति है स्वयं वृहति छंद है माता शारदा अधिष्ठात्री देवी है इस प्रयोग से स्मृति शक्ति, ज्ञान शक्ति और बुद्धि का वर्धन होता है। भ्रमरूपी अंधकार को मिटाने वाला प्रकाशमान ज्योति के सदृष निर्मल ज्ञान प्राप्त होता है । देश का अद्वितीय अभिनव आयोजन: प्रदेश का ही नही बल्कि देशभर का यह अद्वितीय अनुठा अनुपम प्रयोग पूर्व ऋषियों की परम्परानुसार मस्तिष्क कोषिकाओं का पोषक एवं स्मरण शक्ति बढ़ाने में सहायक स्नायुतंत्र को मजबूत करने वाला कुषाग्र बुद्धि मानसिक एवं बौद्धिक क्षमता को बढ़ाने वाला है । क्यों आवश्यक है ब्राह्मीपान? वर्तमान समय में सम्पूर्ण पोषक तत्वों एवं आहार का अभाव तथा टी। वी., कम्प्यूटर, फिल्म, मोबाईल के निरंतर प्रयोग से बच्चों में लगातार बौद्धिक क्षमता की गिरावट हो रही है । ऐसी स्थिति में ब्राह्मी पान ही एकमात्र विकल्प है । जो बिना किसी दुष्परिणाम के बौद्धिक क्षमता में वृद्धि के रूप में चमत्कारिक लाभ देती है । पात्रता: सामान्य तौर पर हर व्यक्ति को ब्राह्मीपान की आवश्यकता है किन्तु ब्राह्मीपान के नियमानुसार 5 वषों से अधिक उम्र के वे बालक/बालिका जो विद्या अध्ययनरत् हो उनकी एकाग्रता स्मरण शक्ति, बौद्धिक क्षमता को बढ़ाने हेतु इसका सेवन अवश्य करें । आयोजन: मुख्यालय से लगभग 40 कि.मी. दूर ग्राम खमरा वि.ख. बिछुआ में बसंत पंचमी सरस्वती जयंती के उपलक्ष्य पर भव्य सरस्वती महोत्सव एवं ब्राह्मीपान का अद्वितीय कार्यक्रम दिनांक 20 जनवरी 2010, दिन बुधवार को प्रात: 8 बजे से पं. रामविशाल शुक्ल के मार्गदर्शन में सम्पन्न होगा । पॉंच चरणों में आयोजित कार्यक्रम में प्रथम चरण - प्रात: 8 बजे से 10 बजे तक । द्वितीय चरण - प्रात: 10 बजे से 12 बजे तक । तृतीय चरण - दोपहर 12 बजे से 2 बजे तक । चतुर्थ चरण - दोपहर 2 बजे से 4 बजे तक तथा पंचम चरण - शाम 4 बजे से 6 बजे तक पूर्ण होगा । इस कार्यक्रम में सरस्वती पूजन एवं कवच धारण के उपरांत ब्राह्मीपान कराया जायेगा । जिसमें उपस्थित होने हेतु इच्छुक केवल मीठा भोजन ग्रहण कर ही निर्धारित सहयोग राशि देकर श्वेत वस्त्र धारण कर कार्यक्रम में उपस्थित होकर लाभ ले सकते है । इसी दौरान दिनांक 16 जनवरी 2010 से 24 जनवरी 2010 तक श्रीमद् भागवत कथा का वाचन पं. रामविशाल शुक्ल के मुखारबिन्द से होगा । इस विशाल भव्य कार्यक्रम में आयोजक समिति द्वारा समस्त इच्छुक धर्मप्रेमी श्रद्धालुओं से कार्यक्रम में उपस्थित होकर पुण्य लाभ लेने की अपील की है।

Wednesday, December 9, 2009

अध्यक्ष का चुनाव सीधा करवाने की योजना

चंडीगढ़(प्रैसवार्ता) हरियाणा सरकार देश के कई राज्यों में महापौर, सभापति और अध्यक्ष के सीधे शहरी निकाय चुनावों में निर्वाचन की व्यवस्था की तर्ज पर हरियाणा में भी लागू करने पर विचार कर रही है, क्योंकि लोकतंत्र को मजबूत बनाने तथा शहरी निकायों को अधिक स्वतंत्र बनाने के उद्देश्य से निकाय प्रमुखों का सीधा चुनाव बेहतर निर्णय साबित हो सकता है। राज्य सरकार इसके लिए नगर पालिका ऐक्ट और नियमों में संशोधन करने जा रही है। सरकार की दलील है कि इस नये निर्णय से न सिर्फ निकायों के काम काज में तेजी आयेगी, बल्कि पार्षदों की खरीद-फरोक्त बंद होने के साथ-साथ गुटबंदी पर अंकुश लगेगा।

रिश्वतखोर पकडऩे को सी.बी.आई की हैल्प लाईन

चंडीगढ़(प्रैसवार्ता) रिश्वत खोरों पर शिकंजा कसने के लिए सी.बी.आई ने मुहिम छेड़ दी है-इसके लिए बकायदा फोन हैल्पलाईन शुरू की गई है और एस.एम.एस के जरिये आम लोगों तक इस नंबर को पहुंचाया जा रहा है। रिश्त मांगने वाले केन्द्र सरकार के अधिकारियों व कर्मचारियों के खिलाफ 0172-2657135/2657469 पर शिकायत दर्ज करवाई जा सकती है। शिकायत कर्ता का नाम व पता गुप्त रखा जाता है। सी.बी. आई चंडीगढ़ के डी.आई.जी महेश अग्रवाल के मुताबिक रिश्वत समाज और देश की जड़ें खोखली कर रहा है-इसलिए सी.बी.आई की इस मुहिम में बढ़ चढ़कर लोगों को भागीदारी बनानी चाहिए।

Saturday, December 5, 2009

एक और लव गुरु, शिष्या से की शादी

47 वर्षीय रामधन ने 19 वर्षीय प्रेमिका से शादी के बाद नौकरी छोड़ी
नई दिल्ली(प्रैसवार्ता) लव गुरु मटुकनाथ की राह पर चलते हुए एक शिक्षक ने अपनी छात्रा से न केवल प्रेम विवाह किया बल्कि उसके लिए नौकरी व घर-परिवार भी छोड़ दिया। मध्य प्रदेश के रतलाम जिले के 47 वर्षीय रामधन ने अपनी 19 साल की प्रेमिका से शादी करने के बाद नौकरी छोड़ कर राजधानी दिल्ली में अपना बसेरा बना लिया है। गुरु-शिष्या से पति-पत्नी बने इस जोड़े को दिल्ली हाईकोर्ट ने सुरक्षा देने को कहा है। दरअसल रतलाम जिले के एक कॉलेज में शिक्षक के पद पर तैनात रामधन को अपनी ही छात्रा से प्रेम हो गया। दोनों ने कुछ दिन पहले शादी कर ली, लेकिन लड़की के घर वालों व समाज के भय से रामधन नौकरी से इस्तीफा देकर प्रेमिका से पत्नी बनी राधा (बदला हुआ नाम) को लेकर राजधानी आ गया। कुछ दिन बाद जब राधा को एहसास हुआ कि उसके परिजन उसे व उसके पति को नुकसान पहुंचा सकते हैं तो उसके दिल्ली हाईकोर्ट में याचिका दायर कर सुरक्षा की गुहार लगाई। न्यायमूर्ति कैलाश गंभीर ने संबंधित थाना प्रभारी को इस प्रेमी युगल को सुरक्षा प्रदान करने को कहा है। साथ ही रामधन को हाईकोर्ट ने इस बात का हलफनामा देने को कहा है कि उसने नौकरी से इस्तीफा दे दिया है और लड़की के पिता को भी रामधन पर लगाए गए तीन-तीन शादी करने के आरोप के बारे में हलफनामा देने को कहा है। हाईकोर्ट ने इसके अलावा रामधन व लड़की के पिता को अगली सुनवाई पर निजी रूप से पेश होने को कहा है। इससे पहले सुनवाई के दौरान रामधन व राधा ने कहा कि दोनों एक दूसरे से प्रेम करते हैं। राधा ने कोर्ट को बताया कि वह 19 साल की है और उसने अपनी मर्जी से रामधन से विवाह किया है। वहीं राधा के पिता ने कहा कि रामधन पहले से तीन-तीन शादी कर चुका है और पहली पत्नी से उसे बच्चा भी है।

हरियाणा की राजनीति में परिवारवाद का बोलबाला

वैसे तो देश भर की राजनीति परिवारवाद अपनी जड़े जमा रहा है, परन्तु हरियाणा प्रदेश की राजनीति पर प्रख्यात पत्रकार चन्द्र मोहन ग्रोवर की एक दिलचस्प रिपोर्ट प्रस्तुत की जा रही है। हरियाणा की राजनीति में कुछ परिवारों का वर्चस्व चला रहा है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में भी हरियाणा राज्य में कुछ ऐसे परिवार हैं, जो पीढ़ी दर पीढ़ी राजनीति पर हावी रहे हैं। भारत में चुनावों की शुरूआत के समय से ही लोग यहां राजनीति में आए और उसके उपरांत उसी परिवार के लोग भतीजा, भतीजी, बेटा बेटी, नाती, दोहते आदि काफी संख्या में राजनीति में सक्रिय हैं। यह अलग बात है, कि कुछ सफल हुए तथा कुछ असफल होकर राजनीति से दूर चले गए। इतना प्रगतिशील व प्रवर्तनवादी राज्य होने के बावजूद हरियाणा की राजनीति सामंतवादी परम्परा से अछूती नहीं रही है और स्पष्ट तौर पर यहां की राजनीति में कुछ गिने चुने परिवार ही सैदव हावी रहे, जो राज्य के सभी वर्गों व सम्प्रदायों से संबंध रखते हैं। पत्रकार चन्द्र मोहन ग्रोवर ने हरियाणा की राजनीति पर दिलचस्प आंकड़े एकत्रित किये हैं। जिनके मुताबिक हरियाणा के स्व. चौ. देवीलाल तथा उनके परिवार को देश में सर्वाधिक चुनाव लडऩे का गौरव प्राप्त है और वह भी विभिन्न क्षेत्रों से। भारत वर्ष में आज भी कोई ऐसा राजनीतिक परिवार नहीं है, जो चौ. देवीलाल के परिवार की बराबरी कर सकता है। विशेष बात यह है कि स्व. देवीलाल और उनके राजनीतिक वारिस बेटे चौ. ओमप्रकाश चौटाला कई बार हरियाणा के मुख्यमंत्री भी रह चुके हैं। यदि विवेचनात्मक ढंग से हरियाणा की राजनीति पर दृष्टि दौड़ाई जाये, तो पता चलेगा कि हरियाणा में एक दर्जन परिवार ऐसे हैं, जिनके सदस्य तीन पीढिय़ों से सक्रिय राजनीति में हैं। इनमे सर्वप्रथम देशबंधु सर छोटूराम का परिवार है, जो 1920 से राजनीति में सक्रिय है। इतना ही पुराना चो. मातू राम सांधी वालों का परिवार है। यह सत्य है कि सर छोटूराम के दो परिवार लगातार राज्य की राजनीति में महत्वपूर्ण पहचान बनाये हुए हैं। दीनबंधु के भतीजे स्व. चौ. चन्द लम्बे समय तक संयुक्त पंजाब और फिर हरियाणा में विधायक रहे तथा हरियाणा विधानसभा के अध्यक्ष भी बने। चौधरी श्री चन्द की पुत्री बसंती देवी भी हरियाणा की विधायक रह चुकी है। दीनबंधु का, चूंकि कोई पुत्र नहीं था, लेकिन उनकी बेटी भगवानी देवी के पति डूमरंखा निवासी चौ. नेकी राम तहसीलदार भी सर्विस से रिटायर होने पर राजनीति में आए और 1968 से 1972 तक हरियाणा के राजस्व मंत्री रहे। इसके बाद उनके पुत्र व दीनबंधु के दौहते विरेन्द्र सिंह सक्रिय राजनीति में है तथा वर्तमान में हरियाणा सरकार के वित्त मंत्री रह चुके हैं, जिन्हें हाल ही में हुए विधानसभा चुनाव में इनैलो सुप्रीमों औम प्रकाश चौटाला ने लगभग 600 मतों से हराया है। चौ. मातू राम 1920 में आलौठ निवासी चौ. लाल चंद से चुनाव तो हार गये थे, लेकिन चुनाव याचिका में उन्होंने चौ. लाल चंद को हरा दिया और मातू राम स्वयं कभी चुनाव नहीं जीत पाये, लेकिन उनके पुत्र रणवीर सिंह विधानसभा के सदस्य व संयुक्त पंजाब में सिंचाई व बिजली मंत्री रहे। 1972 में उनके बड़े बेटे कप्तान प्रताप सिंह किलोई से चुनाव हारे। उनके बाद छोटे पुत्र भूपेन्द्र सिंह हुड्डा, हालांकि विधानसभा का चुनाव दो बार हारे, पर लोकसभा चुनाव में रोहतक से तीन बार पूर्व उपप्रधानमंत्री चौ. देवी लाल को हराकर विजयी रहे, परन्तु वर्तमान में प्रदेश के मुख्यमंत्री हैं, जबकि इनका बेटा दिपेन्द्र हुड्डा वर्तमान में लोकसभा सदस्य है। अलखपुरा के दानवीर सेठ छाजू राम लांबा स्वयं आजादी के पूर्व पंजाब कौंसिल के सदस्य रहे, फिर उनके बड़े पुत्र सजन कुमार पंजाब विधानसभा के सदस्य बने और अब उनके पौत्र पी.के चौधरी प्रदेश भाजपा के वरिष्ठ नेताओं में एक थे। चौ. देवीलाल के पूरे परिवार की गणना दो इकाईयों में की जा सकती है। एक साहब राम और दूसरे चौ. देवीलाल परिवार की। चौ. साहब राम संयुक्त पंजाब के विधायक व एमएल. सी रहे और फिर उनके दामाद महेन्द्र सिंह लाठर सांसद रहे। चौ. साहब राम के पौत्र प्रदीप सिहाग भी राजनीति में है। साहब राम के छोटे भाई चौ. देवीलाल देशभर के उपप्रधानमंत्री के पद पर पहुंचे। उनके तीन पुत्र हरियाणा विधानसभा के सदस्य रह चुके हैं, जिनमें प्रताप सिंह 1967 में विधायक बने। चौ. देवीलाल के अन्य दो बेटे चौ. ओम प्रकाश चौटाला प्रदेश के मुख्यमंत्री व राज्यसभा सदस्य रह चुके हैं, जबकि रंजीत सिंह कृषि मंत्री व राज्यसभा के सदस्य रह चुके हैं तथा योजना बोर्ड के उपाध्यक्ष पद पर भी रह चुके हैं। चौ. देवीलाल के पौत्र तथा चौ. ओम प्रकाश चौटाला के बड़े बेटे अजय चौटाला दो बार राजस्थान विधानसभा के सदस्य रह चुके हैं तथा वर्तमान में डबवाली विधानसभा क्षेत्र से विधायक हैं। अजय चौटाला के छोटे भाई अभय चौटाला भी विधायक रह चुके हैं तथा वर्तमान में जिला परिषद, सिरसा के चेयरमैन है। चौ. देवीलाल के एक अन्य पौत्र रवि सिंह भी राजनीति में हैं। संयुक्त पंजाब में सिंचाई व बिजली मंत्री रहे चौ. लहरी सिंह के बाद उनके भतीजे राजेन्द्र सिंह मलिक हरियाणा में कई बार विधायक व मंत्री रहे और राजेन्द्र सिंह मलिक के पुत्र हरेन्द्र सिंह मलिक सक्रिय राजनीति में हैं। इसी कड़ी में सर छोटूराम की यूनियननिस्ट पार्टी के आजादी से पहले विधायक रहे राम मोहर के पुत्र राव महावीर सिंह 1968 से 1972 तक परिवहन व पशुपाल मंत्री रहे और उनके पुत्र नरवीर सिंह बंसीलाल मंत्रीमंडल में सहकारिता मंत्री रह चुके हैं। सर छोटू राम के ही विश्वस्त साथी यासीन खान स्वंतत्रता से पूर्व यूनियनिस्ट पार्टी के विधायक रहे। इसके बाद उनके पुत्र तैयब हुसैन राजस्थान व हरियाणा के विधायक, लोकसभा सांसद रह चुके हैं और उनके छोटे पुत्र फजल हुसैन राजस्थान राजनीति में सक्रिय हैं। मेवात का ही एक अन्य सियासी घराना अहमद, खुर्शीद अहमद और अंजुमन के रूप में तीन पीढ़ी राजनीति में है। दीनबंधु के एक अन्य सहयोगी खांडा खेड़ी निवासी चौधरी सूरजमल आजादी से पूर्व यूनियनिस्ट पार्टी के विधायक व संयुक्त पंजाब में मंत्री रहे। उनके पुत्र जसवंत सिंह भी मंत्री रह चुके हैं। पानीपत के नत्थू शाह अपने समय के चर्चित नेता रहे, फिर उनके पुत्र हकुमत शाह दो बार विधायक रहे तथा उनके पौत्र बलवीर पाल शाह भी प्रदेश के परिवहन मंत्री रह चुके हैं तथा वर्तमान में भी पानीपत से विधायक हैं। पूर्व प्रधानमंत्री चौ. चरण सिंह की पत्नी गायत्री देवी, हालांकि राजनीति में उत्तरप्रदेश में सक्रिय रही, पर उनका जन्म स्थान कुंडल (सोनीपत) हरियाणा में है। उनके भतीजे ओमप्रकाश राणा हरियाणा से विधायक रह चुके हैं। भाई-भाई बहिन भी हरियाणा की राजनीति में सक्रिय रहे। इनमें साहब राम के भाई चौ. देवीलाल, राव वीरेन्द्र सिंह की बहिन राजकुमारी सुमित्रा देवी, प्रो शेर सिंह बाघपुर निवासी के भाई ओमप्रकाश बेरी, अवतार सिंह भडाना के भाई करतार सिंह, ओम प्रकाश चौटाला, रणजीत सिंह व प्रताप सिंह भाईयों की त्रिमूर्ति, अजय चौटाला व उनके भाई अभय चौटाला, पानीपत के राठी बंधु धर्म सिंह राठी, जय सिंह राठी व धर्मपाल राठी, रहीम खान के भाई सरदार खान मोहम्मद इलियास के भाई हबीबुल्ला आदि प्रमुख उदाहरण हैं। इससे प्रमुख उदाहरण दलवीर सिंह व नेकी राम का है, जो एक साथ संसद के दोनों सदनों के सदस्य रहे। दो पीढिय़ों से, जो परिवार हरियाणा में सक्रिय है, उनके प्रमुख है स्व. चौ. दलवीर सिंह की पुत्री सुश्री शैलजा, जो केन्द्रीय मंत्री है, पूर्व मंत्री केसरा राम के बेटे मनी राम केहरवाला व उनके भतीजे ओम प्रकाश केहरवाला, पूर्व मुख्यमंत्री स्व. बंसी लाल के पुत्र रणवीर महेन्द्रा, दामाद सोमवीर, पुत्रवधु किरण चौधरी (विधायक),भांजे दया नंद व पौत्री ऋुति(सांसद), राव वीरेन्द्र सिंह के बाद उनके पुत्र व राव इन्द्रजीत सिंह व राव अजित सिंह, राव अभय सिह के बाद उनके पुत्र कैप्टन अजय सिह यादव, पंडित भगवत दयाल शर्मा के बाद उनके पुत्र राजेश शर्मा व पुत्री भारती शर्मा, पूर्व मंत्री कप्तान रंजीत सिंह के बाद उनके पुत्र कंवल सिंह हरी सिंह दाबड़ा के बाद उनके पुत्र सुरजीत दाबड़ा, शमशेर सिंह सुरजेवाला पूर्व विधायक और उनके बेटे रणदीप सुरजेवाला विधायक पूर्व विधायक सुंदर सिंह के बेटे राम सिंह, पूर्व मंत्री राव बंसी सिंह के बाद उनके पुत्र राव नरेन्द्र सिंह, हरी सिंह सैनी के बाद उनके पुत्र अत्तर सिंह सैनी, अतर सिंह माढ़ी वाले के बाद उनके पुत्र नपेन्द्र सिंह आदि राजनीति में सक्रिय रूप से उतर चुके हैं। पूर्व मंत्री अजमत खान फिरोजपुर झिरका के बाद उनके पुत्र आजाद मोहम्मद, पूर्व मंत्री व सांसद रहीम खान नूंह के बाद उनके पुत्र इलियास मोहम्मद व हबीबुल्ला, स्व. जगदीश चन्द शाहबाद के बाद उनके पुत्र राम सिंह, स्व. ओम प्रकाश गर्ग के बाद उनके पुत्र पवन गर्ग, पूर्व मंत्री शिव राम वर्मा नीलोखेड़ी के बाद उनके पुत्र राजेश वर्मा, स्व. कर्नल राम प्रकाश के बाद उनकी पुत्री कान्तादेवी, पूर्व विधायक गया लाल के बाद उनके पुत्र पूर्व विधायक उदय भान, पूर्व विधानसभा उपाध्यक्ष देव राज आनन्द के बाद उनके बड़े पुत्र बृज आनन्द, पूर्व मंत्री दल सिंह के बाद उनके पुत्र हरमिंदर सिंह, पूर्व विधायक दुलीचंद राठी पानीपत के बाद उनके तीनों विधायक पुत्र धर्म सिंह राठी, जय सिंह राठी व धर्मपाल राठी, पुत्री मंत्री गोवर्धन दास चौहान की पुत्री संतोष सारवान व पुत्र राजेन्द्र चौहान, पूर्व विधायक टेक राम मुढाल के बाद उनके भाई निहाल सिंह व उनके भतीजे जगत सिंह, हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री भजन लाल के बाद उनकी पत्नी जसमा देवी, पुत्र कुलदीप व चन्द्र मोहन तथा भतीजा दूडा राम पूर्व विधायक (भजन लाल स्वयं सांसद) वर्तमान विधायक कुलदीप हैं तथा पूर्व मंत्री जसवंत सिंह चौहान राई के बाद उनके पुत्र सतपाल आदि सक्रिय राजनीति में हैं। इसके अलावा चौ. देवीलाल के पारिवारिक रिश्तेदार गणपत सिंह के पुत्र डा. केवी सिंह (पूर्व ओएसडीसीएम हरियाणा) पूर्व विधायक महंत गंगासागर के पुत्र दया सागर, पूर्व विधानसभा उपाध्यक्ष चौ. वेद पाल के भतीजे विक्रम सिंह, केन्द्रीय कानून हंस राज भारद्वाज के बहनोई व पूर्व विधायक दया नंद शर्मा, पूर्वमंत्री शांति राठी के पुत्र विक्रम राठी, पूर्व मंत्री माडू सिंह मलिक के पुत्र भूपेन्द्र सिंह व जगजीत सिंह, पूर्व मंत्री जगदीश नेहरा के बेटे सुरेन्द्र नेहरा, पूर्व सांसद विद्या बैनीवाल के पुत्र विनोद बैनीवाल, पूर्व मुख्यमंत्री मा. हुक्म सिंह के बेटे राजवीर सिंह आदि अपनी इस पारिवारिक राजनीति की परम्परा को बरकरार रखने के लिए प्रयासरत है। इस परम्परा में छछरौल विधानसभा क्षेत्र के खान परिवार की चर्चा भी जरूरी है, यहां से मोहम्मद असलम खान दो बार विधायक बने और फिर उनके पुत्र मोहम्मद अकरम खान को विधायकी का अवसर मिला। हिसार के बलवंत राय तायल व बलदेव तायल भी एक ही पारिवारिक परम्परा के है। इस संदर्भ में हरियाणा मं कई ऐसे परिवार है, जहां पति के बाद पत्नी ने पारिवारिक परम्परा को आगे बढ़ाया इस प्रकरण में उल्लेखनीय नाम है, पूर्व विधायक कुंवर गुरदित सिंह की पत्नी शारदा रानी कंवर, मेजर अमीर सिंह की पत्नी लज्जा रानी, पूर्व विधायक जगदीश चन्द्र की पत्नी शन्नो देवी, पूर्व विधायक राम किशन आजाद की पत्नी शीला आजाद कर्नल सिंह की पत्नी शारदा रानी पूर्व मुख्यमंत्री भजन लाल की पत्नी जसमा देवी, पूर्व विधायक जगदीश बैनीवाल की पत्नी विद्या बैनीवाल, पूर्व मंत्री स्व. सुरेन्द्र सिंह की पत्नी किरण चौधरी, पूर्व मंत्री स्व. ओपी. जिन्दल की पत्नी सावित्री जिंदल पूर्व मंत्री मेहता लीला कृष्ण की पुत्रवधू स्वतंत्र बाला इत्यादि एक ही परिवार के दो सदस्यों द्वारा एक दूसरे के खिलाफ चुनाव लडऩे के उदाहरण हरियाणा में हैं। 1991 में स्व. गोवर्धन दास चौहान की पुत्री संतोष सारवान तथा उसके सगे भाई राजेन्द्र चौहान ने डबवाली विधानसभा से एक दूसरे के खिलाफ चुनाव लड़ें। इसी चुनाव में बहादुरगढ़ क्षेत्र से कांग्रेस प्रत्याशी सुरजमल के खिलाफ उनके सगे भतीजे महावीर सिंह ने बतौर आजाद उम्मदीवार चुनाव लड़ा। 1996 में हथीन क्षेत्र से पूर्व विधायक भगवान सहाय रावत के विरूद्ध उसकी सगी बहिन दया रावत ने चुनाव लड़ा। इसी चुनाव में किलोई से कृष्ण मूर्ति हुड्डा को उसके चचेरे भाई ने चुनावी चुनोती दी। वर्ष 2004 में ऐलनाबाद क्षेत्र से कांग्रेस प्रत्याशी मनी राम केहरवाला को उसके सगे भतीजे ओमप्रकाश केहरवाला की बगावत का सामना करना पड़ा। स्पष्ट है कि हरियाणा की राजनीति में परिवारवाद भाई भतीजेवाद, पुत्र पुत्री व दामादवाद बहुत हावी रहा और कुछ गिने चुने परिवार ही सामंतवादी परम्परा अपनाकर यहां की राजनीति में अपना वर्चस्व कायम करते रहे हैं। सत्य तो यह है कि हरियाणा की राजनीति कुद चुनिन्दा घरानों तक ही सीमित होकर रह गई। हरियाणा की राजनीति में स्व. चौ. देवीलाल के परिवार की महिलाएं अभी तक राजनीति के कोसो दूर हैं, जबकि पूर्व मुख्यमंत्री भजन लाल व बंसीलाल के परिवार की महिलाएं राजनीति में सक्रिय देखी जा सकती है। -चन्द्र मोहन ग्रोवर (प्रैसवार्ता)

Wednesday, December 2, 2009

महात्मा गांधी का राशन कार्ड

हैदराबाद(प्रैसवार्ता) जी हां, यह सत्य है कि आंध्र प्रदेश के सरकारी तंत्र ने महात्मा गांधी के नाम पर एक राशन कार्ड जारी किया है, जिसमें बकायदा महात्मा गांधी की फोटो लगी हुई है। चौकाने वाली बात यह है कि उस राशनकार्ड में गांधी जी के हत्यारे नाथूराम गौडसे का नाम उनके पिता के रूप में लिखा गया है। फर्जी राशन कार्डों का पता लगाने के लिए चिंतूर जिले में चलाये गए एक अभियान के दौरान इस कार्ड के सामने आने पर जिला प्रशासन हरकत में आया है और इसकी जांच के आदेश दिये। यह राशन कार्ड चिंतूर जिले के राम चन्द्र पुरम पंडल के चित्रागुढां ग्राम में जारी किया गया था, जिस पर महात्मा गांधी का चित्र लगा है और उनका नाम एम. के.गांधी थाटा (तेलगू भाषा में दादा), आयु 65 वर्ष, पिता का नाम गौडसे, पता 15-46541 गांधी स्ट्रीट, गांधी रोड लिखा है। यह पता उचित मूल्य की एक दुकान का है।

Tuesday, December 1, 2009

सास भी बहू क्यों थी?

यदि उनका सरनेम ''त्रिपाठी'' होता तो वे ''त्र'' से आरंभ होने वाले धारावाहिक बनाती यथा ''त्रिशूल'' सास के कमरे में। मगर चूंकि (1) उनका सरनेम कपूर है और (2) महिला ज्योतिषी ने उनसे कहा है, अत: उनके धारावाहिक '''' से आरंभ होते है यथा क्योंकि सास भी कभी बहू थी, कुसुम, कहानी घर-घर की आदि। और वे घर क्या हैं, मुगलकालीन महल हैं। भोपाल, नागपुर या इन्दौर में तो ऐसे घर एकाध ही होंगे, फिर वह कहानी, घर-घर की कैसे हुई? यदि वे ''कहानी झोपड़ी झोपड़ी'' की भी बनाती तो उनकी झोपड़ी से हमारे घर शर्मिन्दा होते। उनके घर-घर के पात्र तो महंगी साडिय़ां या सूट पहनते हैं। उन्हें हमारे घर की महिलाएं और हम सपने में छूने या देखने से डर जायेँ। उनके महलों और हमारे घर में एक ही साम्य है, वह यह कि नौकर दोनों जगह नहीं दिखते। भगवान जाने उनके घर में पार्वती भाभी पोंछा कब लगाती होंगी। बहरहाल, रात्रि के नौ बजे के बाद प्रथम पुरूष के घर में महिला सशक्तिकरण प्रहर चालू हो जाता है। नौ बजे तक यदि प्रथम पुरूष ने खाना खा लिया तो खा लिया, नहीं तो उसकी श्रीमती और दोनों बच्चियां सोफे पर दचक कर बैठ जाती हैं। उस समय उनसे एक गिलास पानी भी मिलना मुहाल हो जाता है। उस इडियट से पार्वती भाभी, तुलसी, इत्यादि बार-बार आकर उन बेचारियों को रूला जाती हैं। आंसू पोछने के लिए रूमालों की अदला बदली होने लगती है। हर सीरियल के लिए ताजा रूमाल निकाला जाता है। प्रथम पुरूष के घर के सदस्यों की मानसिक दशा पार्वती भाभी की मानसिक दशा पर निर्भर रहती है। तुलसी दुखी तो उसकी पत्नी महादुखी। उसे वे दिन स्मरण कराये जाते हैं जब उसने दो साल पहले होटल में खाना खिलाने का वादा किया था और वह भूल गया था। वहां तुलसी पर अन्याय होता है यहां उसको दूरदर्शन के सामने बिठाल कर उलाहना दी जाती है। अगर यह और वह डेटिंग करते हैं तो भगवान से प्रार्थना करता है कि हे, भगवान, उसको वह धोखा दे नहीं तो मेरी शामत जायेगी। यदि यह उसको धोखा देता है तो मुझे कसमें खाकर विश्वास दिलाना पड़ता है कि अगले एपीसोड में यह उससे माफी मांग लेगा। मुझे शक है कि आदित्य बिड़ला या अजीम प्रेमजी या टाटाज या मेडम गोदरेज या अम्बानीज इन धारावाहिकों को देखते होंगे। मुझे तो इन धारावाहिकों के धड़ से दिखते सिर पैर तो समझ में ही नहीं आते। क्योंकि सास भी कभी बहू थी में मुगल खानदान की तरह एक साथ पांच पीढिय़ों की सास और बहू दिखाई जाती है। एक धारावाहिक में मुझे सन्जू दिखा तो मैंने कहा अरे यह तो क्योंकि, सास भी कभी बहू थी में अंश था, तो मेरी बड़ी बेटी ने ठंडे स्वर में कहा, पापा सीरियल रोज और ध्यान से देखा करो। अंश वहां मर चुका है। उन पात्रों को देखकर मेरी हिम्मत यह बतलाने की नहीं होती कि अमुम पात्र कुसुम में दाहिने तरफ लौंग पहिने थी और इस सीरियल में बायीं तरफ। प्लास्टिक सरजरी में नथुनों के साथ-साथ लौंग का भी स्थानांतरण हो जाता होगा और उस दिन तो हद ही हो गई। मेरा एक मित्र कहने लगा कि उसकी पत्नी कार खरीदने पर जोर दे रही है। मैंने कहा कि खरीद लो। मित्र घबराया हुआ था। मैंने पूछा इसमें घबराने की क्या बात है? तुम रिश्वत तो खाते ही हो कार आसानी से खरीद सकते हो। उसने कहा यह इतनी सरल बात नहीं है। पत्नी देवरानी को कार से धक्का देकर ही घायल करना चाहती है, जैसा कि अमुक सीरियल में हुआ था। ये सीरियल कब तक दिखेंगे कोई नहीं जानता। इसके निर्माता बडज़ात्या या चोपड़ा जैसे गौरतमंद नहीं हैं, किसी पटकथा के कारण उनके रामायण या महाभारत जैसे सीरियल साल दो साल में सप्ताह की रेट से खत्म हो गये। ये सीरियल तो ब्रम्हा की इस दृष्टि से अगली दृष्टि में भी शायद चलते रहें। हर महिला के विवाहेत्तर सम्बन्ध बतलाये जा रहे हैं। हर पात्र को षडय़ंत्रकारी और हत्यारा बतलाया जा रहा है। क्या भारतीय महिलाएं और संस्कृति इतनी ही निकृष्ट है? आश्चर्य है कि जरा-जरा सी फालतू बातों पर बवाल मचा देने वाला कोई भी महिला संगठन इन विकृत प्रस्तुतियों पर आवाज नहीं उठाता। -डॉ. कौशल किशोर श्रीवास्तव (प्रैसवार्ता)

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